ताकाझांकी का ‘सौदा’- जासूसी से बेपर्दा ‘जनतंत्र ‘


 

देश में पत्रकारों, नेताओं और अफसरों की जासूसी हो रही है। पेगासस सॉफ्टवेयर सिर्फ सरकारें ही खरीद सकती है, पर भारत सरकार खामोश है। वो सिर्फ देख और सुन रही है। लोगों की निजी ज़िंदगी की तस्वीरें और सन्देश तक चोरी किये जा रहे है। इस नग्न व्यवस्था में दुनिया के सामने बेपर्दा हो रहा हमारा लोकतंत्र।

पंकज मुकाती (संपादक, पॉलिटिक्सवाला )

दो मामले इस वक्त चर्चा में हैं। हालांकि दोनों एक दूसरे से बहुत अलग। सीधे-सीधे दोनों में कोई साम्य नहीं। फिर भी साम्य है। बहुत कुछ एक सरीखा है। दोनों मामले तकनीकी हैं। पहला मामला फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति कारोबारी राज कुंद्रा का। दूसरा इजरायली कंपनी पेगासस के जासूसी सॉफ्टवेयर का। इस कंपनी के सॉफ्टवेयर के जरिये बड़ी हस्तियों के फ़ोन में घुसकर उनकी जासूसी की जा रही है।

इस सॉफ्टवेयर के जरिये न सिर्फ आपकी बातें सुनी जा रही है, बल्कि ये लगातार आपकी तस्वीरें भी ले रहा है। आपके आसपास की तस्वीरें भी इसमें दर्ज हो रही है। दूसरी तरफ राज कुंद्रा ने पोर्न फ़िल्में बनाई। कुछ बताकर कुछ ऑडिशन के नाम पर।

कुल मिलाकर दोनों काम ‘बिलो द बेल्ट’ ,बेहूदा और अवैध हैं। दोनों निजता से जुड़े हैं। दोनों में तकनीक का दुरुपयोग है। दोनों में लोगों के बदन से तौलिया खींचने का काम किया। इजरायल के सरकारी नियमों के अनुसार ये कंपनी सिर्फ दूसरे देशों की सरकारों को ही ये तकनीक बेच सकती है। इसका मकसद आंतकवादियों की गतिविधि को रोकना है।

हमारी सरकार ये मानने को राजी नहीं कि उसने ये इजरायल से ख़रीदा है। साथ ही सरकार ने इससे इनकार भी नहीं किया। अगर सरकार ने नहीं खरीदा तो ये और भी बड़ा मामला है। आखिर हिंदुस्तान के नामी लोगों की जासूसी कौन कर रहा है। सरकार को तत्काल जांच के आदेश देना चाहिए। उस कंपनी को भी नोटिस देना चाहिए। पर सरकार ने ऐसा नहीं किया।

क्या इसे चोर की दाढ़ी में तिनका माना जाए। ट्विटर, फेसबुक को लेकर कानूनी लड़ाई को तैयार सरकार इस बड़े मामले में कानून के बजाय दूसरे तरीके पर क्यों जोर दे रही है। इसे विदेशी साजिश बताने पर तुली है। देशद्रोही इसके पीछे हैं। इसका जिम्मेदार भी मीडिया और विपक्ष को बताया जा रहा है। आखिर कोई अपने ही निजी जीवन को सार्वजनिक करने का सॉफ्टवेयर क्यों खरीदेगा। सरकार के दावे सच नहीं दिखते, फिर भी जांच की जिम्मेदारी किसकी है ?

द वायर ने लिखा कि हिंदी अखबारों में 90 फीसदी अखबारों ने इसे आधा-अधूरा छापा या छापा ही नहीं। आखि पूरी दुनिया की सबसे बड़ी खबरों में एक खबर पर इतनी चुप्पी क्यों? भारत उन 10 देशों में शामिल है जिनमें पत्रकारों, राजनेताओं, न्यायाधीशों, अफसरशाही, सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोन के ज़रिये उनकी जासूसी की जा रही है।

यह कहा जा रहा है कि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ। देश में जासूसी और फ़ोन टैपिंग का सिलसिला पुराना है। पर ये समझना होगा कि यह जासूसी अब तक की पारंपरिक जासूसी से अधिक ख़तरनाक है। इसमें न सिर्फ आपके फ़ोन सुने जा रहे हैं बल्कि आपके सन्देश पढ़े जा रहे हैं, आपकी तस्वीरें ली जा रही है। आपकी लोकेशन ट्रेस की जा रही है।

आप पर न सिर्फ़ हर पल नज़र रखी जा रही होती है बल्कि आपने जो भी डाटा अपने मोबाइल में रखा है,वह सब बड़े आराम से चोरी किया जा रहा है। आपको पूरी तरह बेपर्दा किया जा रहा है। आपकी निजी ज़िंदगी कुछ भी नहीं रही आपके हर पल उनकी नजरों में है, ये किसी भी पोर्न फिल्म बनाने वाले से ज्यादा बड़ा अपराध है।

पोर्न फिल्म बनाने वाला जिसकी फिल्म बना रहा उसकी सहमति भी उसमे शामिल है। यहाँ आपका पूरा निजी जीवन उघाड़ा जा रहा, आपको निर्वस्त्र किया जा रहा वो भी चोरी से। ये खतरा है, हमला है। इसके उपयोग करने वाले बड़ी सजा के हकदार है। सामान्य भाषा में मैं आपके फोन को नियंत्रित कर सकता हूं, उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकता हूं। इस तकनीक को पेगासस कहते हैं।

वरिष्ठ लेखक अपूर्वानंद लिखते हैं- क्या भारत की जनता को यह सूचना उसके पूरे ब्योरे में नहीं मिलनी चाहिए? क्या उसे इस कांड के निहितार्थ के बारे में और उसके क्या नतीजे खुद जनता के लिए हो सकते हैं, नहीं बताया जाना चाहिए?

क्या भारत के लोगों को नहीं मालूम होना चाहिए कि उनका देश इस मामले में किन देशों की क़तार में है? भारत जो खुद को जनतंत्र कहता है, और वह बड़ी हद तक अभी भी जनतंत्र है, सऊदी अरब, अज़रबैजान, कजाकिस्तान, बहरीन, हंगरी, रवांडा जैसे मुल्कों में शामिल हो गया है जिन्हें हम जाहिरा तौर पर जनतंत्र नहीं कह सकते. उनकी पांत में खड़े होना हम पसंद करेंगे।

क्या यह खबर भारत की जनता को नहीं मिलनी चाहिए ? यह अलग सवाल है कि इस खबर से कौन चिंतित होता है और कौन नहीं. लेकिन यह खबर कि हम जनतंत्र का भ्रम जी रहे हैं हो सकता है। आखिर इस जनतंत्र का मीडिया खामोश और अधूरी जानकारी देकर कौन सा और किस तरह का देश खड़ा कर रहा है। जनतंत्र की धसान में मीडिया बड़ा दोषी है।

भारत में ऐसे लोग अभी भी हैं जो जनतंत्र को गंभीरता से लेता हैं। उसका होना, न होना उनके लिए जीने-मरने का सवाल है। वे सिर्फ़ ख़ास लोग नहीं हैं. वे भारत के मतदाता हैं. वे वोट देने के लिए कई बार पूरा दिन ही नहीं लगाते, दूसरे राज्यों, शहरों में अपना कामकाज छोड़कर सिर्फ वोट देने के लिए अपने मतदान क्षेत्र तक अपने पैसे से सफर करते हैं। क्या ऐसे ईमानदार लोगों के साथ देश में ऐसी सरकारी बेईमानी ठीक है।