‘गोदी’ कथा -1… दिग्विजयजी आपको तो कथावाचकों पर सवाल उठाने का हक़ ही नहीं !

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मिर्ची और कंप्यूटर बाबा जैसे संतों के साथ राजनीति की रणनीति बनाने वाले दिग्विजय का पंडित प्रदीप मिश्रा पर यूं सवाल उठाना पेट में दर्द जैसा ही है। वो रिन साबुन का विज्ञापन याद है न। शायद यहाँ भी मामला कुछ ऐसा ही है – तेरा संत मेरे संत से ज्यादा चापलूस कैसे ?

पंकज मुकाती (संपादक, पॉलिटिक्सवाला )

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, फिर चर्चा में हैं। वे जब भी मुंह खोलते हैं, विवाद जरूर सामने आता है। ताज़ा मामला कथावाचन का है। दिग्विजय ने शिवपुराण के कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा को भाजपा का प्रचारक कहते हुए सवाल उठाया है।

दरअसल, पंडित मिश्रा पिछले कुछ महीनों से लगातार हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा अपनी कथाओं में उठा रहे हैं। दो दिन पूर्व पंडित मिश्रा ने कहा कि मोदी है, तो हिन्दू है। मोदी नहीं रहेगा तो रोओगे।

इस पर दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाया कि क्या मोदी के पहले हिन्दू धर्म नहीं था। क्या शिवपुराण में मोदी का जिक्र है ? पंडित जी शिवपुराण कर रहे हैं, या मोदी का गुणगान, भाजपा का प्रचार।

जाहिर है, विवाद होना ही था। भाजपा के नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि दिग्विजय तो हमेशा से हिन्दू संतों का अपमान करते हैं। उन्हें जाकिर नायक के गुणगान में सुख मिलता है। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मोदी की प्रशंसा से दिग्विजय के पेट में दर्द क्यों ?

ये तो हुई राजनीति। धार्मिक सभा में राजनीतिक कथा होनी चाहिए या नहीं ? इस पर बाद में विस्तार से लिखेंगे। पर धार्मिक मंच से नेता के प्रचार पर सवाल उठाने का खुद दिग्विजय सिंह को हक़ नहीं है। खुद दिग्गी राजा संतों का उपयोग अपने फायदे के लिए करते रहे हैं। दिग्विजय ने खुद एक शंकराचार्य को कांग्रेसी शंकराचार्य की तरह स्थापित किया हुआ है ।

ये शंकराचार्य तमाम मंचों पर दिग्विजय सिंह और सोनिया गांधी की शान में मंत्रोच्चार करते रहे हैं। दिग्विजय जब कोई फैसला लेना या टालना हो तो शंकराचार्य जी को साक्षी रखते रहे हैं। मौलवी, क़ाज़ी, धर्मगुरुओं के तो कहने ही क्या। वे तो दिग्विजय के इशारे पर फतवे तक जारी करते रहे हैं। कांग्रेस के सत्ता में रहते कितने धर्मगुरुओं को अपनी शान में कसीदे पढ़ने के बदले कितनी जमीने आश्रमों/ मस्जिदों के नाम पर बाँट दी ये सब जानते हैं।

आखिर दिग्विजय उन यादगार नामों वाले अपने करीबी संतों को कैसे भूला सकते है, जो सिर्फ चाटुकारिता और उग्रता ही करते रहे। कंप्यूटर बाबा, मिर्ची बाबा।

भोपाल लोकसभा चुनाव के दौरान तो दिग्विजय सिंह ने एक सरकारी मैदान में बैठकर इन बाबाओं के साथ यज्ञ ही कर डाला। इन साधू-संतों ने मई की भरी दुपहरी में दिग्विजय के लिए रोड शो भी किया।

मिर्ची बाबा यहीं नहीं रुके। घोषणा कर दी कि यदि दिग्विजय चुनाव हार गए तो वे आत्मदाह कर लेंगे। दिग्विजय तो करीब तीन लाख 62 हजार वोट से हार गए। बाबा अगले चुनाव के लिए मिर्ची इकठ्ठा करने में लगे हुए हैं।

कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आचार्य प्रमोद कृष्णन लगातार प्रचार करते हैं। वे अपनी धर्म सभाओं में भी खुलकर ऐसे प्र वचन देते हैं। मिर्ची और कंप्यूटर बाबा जैसे संतों के साथ राजनीति की रणनीति बनाने वाले दिग्विजय का पंडित प्रदीप मिश्रा पर यूं सवाल उठाना पेट में दर्द जैसा ही है। वो रिन साबुन का विज्ञापन याद है न। शायद यहाँ भी मामला कुछ ऐसा ही है – तेरा संत मेरे संत से ज्यादा चापलूस कैसे ?

अध्याय-2 में पढ़िए- कैसे न्यूज़ चैनल के एंकर को भी पीछे छोड़ रहे हैं कथावाचक। ऐसे वाचकों को गोदी वाचक कहेंगे।

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