एक योगी का फैसला- लाउडस्पीकर हद में रहें !

 

वैसे भी सैकड़ों बरस पहले ऐसी आवाज लगाने की खिल्ली उड़ाते हुए इतिहास के सबसे हौसलामंद और सुधारवादी संत-कवि कबीर ने लिखा था- कांकड़ पाथर जोडक़र मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे बहरा हुआ खुदाय।

सुनील कुमार (वरिष्ठ पत्रकार )

कई बार चीजों के सुधरने के पहले उनका पूरी तरह से बिगड़ जाना भी जरूरी होता है। हिन्दुस्तान में अभी धार्मिक कट्टरता को बढ़ाने का सबसे बड़ा हथियार, लाऊडस्पीकर इतना लाऊड होते चले गया था कि अब सरकारों को उसका गला दबाने की जरूरत महसूस हो रही है।

बात शुरू तो हुई थी मस्जिदों में लगे हुए लाऊडस्पीकरों को बंद करवाने की साम्प्रदायिक जिद से, लेकिन अब देश के दो सबसे बड़े राज्य, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश धर्मस्थलों के लाऊडस्पीकर पर काबू के लिए नियम बना रहे हैं।

महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ शिवसेना-गठबंधन के शिवसेना-कुनबे से अलग हुए और पूरी तरह से महत्वहीन और अप्रासंगिक हो चुके राज ठाकरे ने मस्जिदों से लाऊडस्पीकर हटाने के लिए सरकार को तीन मई तक का अल्टीमेटम दिया है।

राज ठाकरे को हिन्दू ओवैसी करार देते हुए भी शिवसेना को यह सोचना पड़ रहा है कि अगर मस्जिदों के सामने सचमुच ही लाऊडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा पढ़ी जाएगी तो क्या उससे होने वाला टकराव सचमुच ही काबू किया जा सकेगा?

और कुछ ऐसी ही मजबूरी सरकार चलाने के लिए उत्तरप्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिख रही है जिनके सामने अभी कोई चुनाव नहीं है, और अभी तुरंत किसी ध्रुवीकरण की मजबूरी नहीं है, तो ऐसे में योगी ने भी कल अपने अफसरों की बैठक लेकर कहा कि प्रदेश में किसी धर्मस्थल से उसके लाऊडस्पीकर की आवाज बाहर नहीं आनी चाहिए।

यह बात मस्जिदों के अलावा दूसरे धर्मस्थलों पर भी लागू होगी, और हो सकता है कि देश में अराजकता और उससे खड़े होने वाले गृहयुद्ध सरीखे खतरे को टालने के लिए योगी का यह समय पर उठाया गया कदम है, और हमारा यह मानना है कि देश की तमाम सरकारों को यह करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट और बहुत से हाईकोर्ट के शोरगुल रोकने, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों के लिए सडक़ों पर म्यूजिक सिस्टम बजाकर किए जाने वाले शोरगुल को रोकने के लिए अलग-अलग समय पर आए हुए आदेशों को राज्य सरकारों और पुलिस-प्रशासन ने मोटेतौर पर कचरे की टोकरी में डाल रखा है क्योंकि अराजक जनता को नाराज करने की जहमत उठाना कोई नहीं चाहते।

जब धर्म शुरू हुए उस वक्त कोई लाऊडस्पीकर नहीं थे। ईश्वर अगर कहीं था, तो वह बिना लाऊडस्पीकर के भी संतुष्ट था। यह तो बाद के बरसों में टेक्नालॉजी ने लाऊडस्पीकर मुहैया कराए, और हमलावर मिजाज वाले तमाम धर्मों ने अपना बाहुबल दिखाने के लिए अधिक से अधिक लाऊडस्पीकर लगाना शुरू किया।

कुछ धर्मों में उपासना के खास समय के लिए भी लाऊडस्पीकर लगाए गए, ताकि उनके आसपास बसे हुए उसी धर्म के लोगों को खबर हो जाए, और वे नमाज या किसी और किस्म की उपासना के लिए पहुंच जाएं।

लेकिन टेक्नालॉजी ने ही लाऊडस्पीकर के बाद घडिय़ां हर कलाई पर पहुंचा दीं, दीवारों पर पहुंचा दीं, अलार्म घडिय़ां आ गईं, और अब तो हर किसी की जेब में अलार्म वाले मोबाइल फोन हो गए हैं। इसलिए अजान या भजन का वक्त बताने के लिए लाऊडस्पीकर की कोई जरूरत नहीं रह गई है।

वैसे भी सैकड़ों बरस पहले ऐसी आवाज लगाने की खिल्ली उड़ाते हुए इतिहास के सबसे हौसलामंद और सुधारवादी संत-कवि कबीर ने लिखा था- कांकड़ पाथर जोडक़र मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे बहरा हुआ खुदाय।

मतलब यह कि कंकड़-पत्थर जोडक़र मस्जिद बना ली, और उस पर चढक़र मुल्ला इस तरह से अजान देता है कि मानो खुदा को कम सुनाई देता है।
जिन लोगों को यह लगता है कि लाऊडस्पीकरों पर रोक मुस्लिम समाज पर हमला है, उन्हें तमाम धर्मस्थलों से लाऊडस्पीकरों को हटाने को एक अलग नजरिये से देखना चाहिए।

नमाज की अजान तो दिन में पांच बार एक-दो मिनटों की होती है, लेकिन दूसरे धर्मस्थलों से तो रात-रात भर लाऊडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों का जीना ही हराम कर दिया जाता है।

अब अगर उत्तरप्रदेश में योगी के ताजा हुक्म से सभी धर्मस्थलों का धार्मिक शोर उनके अहाते के भीतर तक सीमित रख दिया जाएगा, तो इससे लोग एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे, और यह सिर्फ मुस्लिम समाज पर कोई हमला नहीं रहेगा।

देश की हर प्रदेश सरकार को ऐसा ही हुक्म देना चाहिए और उसे पूरी कड़ाई से लागू करना चाहिए। हम इसी जगह पर यह बात लिखते आ रहे हैं कि धर्म को निजी आस्था या धार्मिक परिसर के भीतर का काम रखना चाहिए, और सडक़ों पर धर्म के बाहुबल का प्रदर्शन बंद करना चाहिए।

उत्तरप्रदेश में कल मुख्यमंत्री ने बिना इजाजत धार्मिक जुलूस पर रोक लगाने की बात भी कही है। धार्मिक जुलूस की इजाजत ही नहीं देनी चाहिए क्योंकि यह देश बारूद के ढेर पर बैठा हुआ देश हो गया है, और किसी भी दिन किसी एक जगह का दंगा देश में दूसरे शहरों तक भी फैल सकता है।

धर्मस्थलों का शोरगुल, और सडक़ों की आवाजाही तबाह करते धार्मिक जुलूस, दोनों ही पूरी तरह गैरजरूरी हैं, और दोनों से ढेर तनाव खड़े हो रहे हैं। समझदार राज्यों को इन दोनों पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।

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