इस बार संगठन पर नहीं चलेगा शिव राज !


मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के डेढ़ साल ने भाजपा को सत्ता और संगठन को अल-अलग रखने की जरुरत को समझा दिया, संगठनों की ताज़ा नियुक्ति ने तय किया कि संगठन पर सत्ता नहीं रहेगी हावी

नितिन शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार )

….अरसे बाद। लगभग एक डेढ़ दशक बाद भोपाल से हुए फैसले में संगठन के जिंदा होने के सबूत मिले। अन्यथा पार्टी विथ ए डिफरेंस कहे जाने वाली भाजपा में सत्ता और संगठन का पूरी तरह ओर बुरी तरह घालमेल कह लो या गठबंधन हो चुका था। सत्ता और संगठन के बीच की एक महीन दीवार पाट दी गई थी और नगर-जिला अध्यक्ष तो दूर… मंडल ओर बूथ अध्यक्ष जैसी अहम संगठन की कड़ी भी सम्बंधित इलाके के विधायक की पसंद-नापसंद से तय की जाने लगी थी। या यूं कह ले कि सत्ता…संगठन पर सवार हो चुकी थी और संगठन मंत्री तक सत्ता की पसन्द से ही मनोनीत होने लगे थे।

अरसे बाद…जिला अध्यक्षो की नामजदगी के बाद ये महसूस हुआ कि पार्टी में शायद संगठन की अहमियत को फिर से सुमिरन किया गया है।

नए बने जिला-नगर अध्यक्षो की फेहरिस्त ये भी बता रही है कि अब भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन के युग का सूत्रपात भी हो चुका है। जिस तरह से युवा नेतृत्व को इस फेहरिस्त में जगह मिली है, वो साफ इशारा कर रही है कि अब भाजपा में वो ही तयशुदा नाम और चेहरे ज्यादा दिन नही चलने वाले जो लगातार व ज्यादातर समय से किसी न किसी पद पर काबिज हो जाते थे।

चाहै वो संगठन के पद हो या फिर सत्ता से जुड़े विधायक-पार्षद ओर निगम मंडलो के मुखिया बनने का मामला हो। संगठन में हुआ ये बदलाव इशारा कर रहा है कि आने वाला समय भाजपा के ‘स्थापित’ उन नेताओं के लिए खतरे की घण्टी है…जो कांग्रेस की तर्ज पर भाजपा में भी किसी न किसी ‘आका’ के दम पर पुनः पुनः लौटकर सत्ता से जुड़े लाभ के पदों पर जम जाते थे। ये बदलाव तीन साढ़े तीन साल बाद होने वाले चुनाव में भी साफ नजर आएगा…ये अब कहा जा सकता है ओर कई युवा चेहरे ताल नगरी भोपाल तक पहुंच सकते है। यानी स्थापित ओर ‘ बूढ़ा’ हो चुका नेतृत्व अब भाजपा में बीते दिनों की बात होने की शुरुआत हो चुकी है।
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‘रिटर्न्स आफ नाथ’ ने बदले ‘सरकार’ के सुर-‘दादा दयालु’ भी आये याद

नई पारी में सरकार के मुखिया बदले बदले से नजर आ रहे है और इस बार ये साफ दिख रहा है कि वे सत्ता में भागीदारी एकाकी न रखते हुए सहयोगियों को भी अहमियत देंगे। ऐसा किनारे पर लटकी सरकार को मजबूत करने के लिए हो रहा है जिसमे बार बार ये स्वर तेज हो रहा है कि कमलनाथ फिर पलटवार कर सकते है।

ऐसे में अकेले सरकार के मुखिया प्रदेश को बचा ले जाये…ये सम्भव नही। लिहाजा इस बार सबको ‘साथ ले’ और ‘साधने’ की रणनीति पर काम शुरू हुआ है। ये रणनीति इंदौर के ‘दादा दयालु’ (रमेश मेंदोला) को लाल बत्ती दिला सकती है जिसके ठोस इशारे भी अहिल्या नगरी तक आ गए है।

निगम मंडलो में नियुक्ति भी जल्द-सावन को भी एडजस्ट करने की तैयारी

भोपाल ने ये संकेत भी दिये है कि इस बार निगम मंडल में भी जल्द नियुक्ति कर नेताओ को एडजस्ट किया जाएगा। सूत्र ये काम भी महीनेभर में ही हो जाने का इशारा कर रहे है। यानी ‘सत्ता’इन पदों को लेकर अब पिछली बार की तरह नेताओ को चुनाव आ जाने तक ‘ टूंगा’ नही पाएगी। व

ही सांवेर ओर जिले की राजनीति से जुड़े एक अहम किरदार सावन सोनकर को भी एडजस्ट करने की तैयारी भी शूरु हो गई है ताकि ‘ तुलसी भिया’ के लिए रास्ता निष्कंटक हो सके। वही इंदौर में भी विकास प्राधिकरण सहित अन्य पदों पर भी युवा नेतृत्व की ताजपोशी की उम्मीद जाग गई है। इस मामले में संघ-संगठन के प्रति निष्ठा ओर अनुभव को पैमाना बनाया गया है


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