पत्रकारिता की आत्ममुग्धता … देश देख रहा है.
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पत्रकारिता की आत्ममुग्धता … देश देख रहा है.

मैंने पाया कि रवीश कुमार पांडे एक ही सिरे पर अटके हुए हैं। उनके शो में उठाए गए कई मसलों की हकीकत भी सामने आ चुकी है कि किस तरह बेबुनियाद विषयों, फेक खबरों को लेकर सरकार पर एक और प्रहार का मौका कैसे उन्हांेने लपका और पोल खुलने पर सॉरी कहने कैमरे पर पलटकर नहीं आए।

#विजयमनोहरतिवारी

अपनी टीम में उत्साह की आग फूंकने का दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याज्ञनिक का एक खास अंदाज था। वे ऐसे मौके पर अक्सर अतिरेक में ही होते थे। 2011 में संडे जैकेट शुरू हुआ तो मैं उनकी टीम का हिस्सा था। देश के कोने-कोने से नए-नए विषयों पर ग्राउंड और लाइव रिपोर्ट के कवरेज की जिम्मेदारी थी। जब भी कोई कठिन स्टोरी का विषय वे स्वीकृत करते तो अपनी मेज के पीछे खड़े होकर उनकी तकरीर सुनने लायक होती।

-‘ये स्टोरी इतिहास में दर्ज होगी। जर्नलिज्म में ऐसे मौके बहुत कम आते हैं। और ये मत भूलिए कि देश आपको देख रहा है कि इस बार विजय मनोहर तिवारी क्या लेकर आ रहे हैं? 13 राज्यों में तीन भाषाओं में 50 लाख कॉपियों के संडे कवर पर आपका इंतजार होता है। डिजीटल पर आपकी रीच अलग है।’

एक तरफ शरद गुप्ता, दूसरी तरफ विपुल गुप्ता, पीछे प्रदीप कुशवाह और बगल में धीरेंद्र राय धीर-गंभीर होकर टकटकी लगाकर मेरी ओर देखते तो पल भर के लिए मुझे भी लगता कि वाकई देश मेरी तरफ देख रहा है। आइडिएशन की मीटिंगों में कल्पेशजी के उस अंदाज की पैरोडी मैंने अपने अंदाज में पेश की थीं।

एक बार आॅफिस कुछ देर से पहुंचा तो किसी ने पूछा कि कहां थे? मैंने थके-हारे अंदाज में जोर से श्वांस लेते हुए कहा कि मत पूछो बड़ी मुश्किल से आ पाया हूं। उन्होंने कहा कि क्या हुआ?

मैंने विस्तार से बताया- ‘अपने घर से निकला तो सड़क के दोनों तरफ भारी भीड़ थी। मेन रोड पर आया तो ट्रैफिक रुका हुआ था और दोनाें तरफ बिल्डिंगों की छत पर लोग लटक रहे थे। मैंने समझा कि मेरे आगे पीछे कहीं सलमान या शाहरूख की गाड़ियां तो नहीं हैं।

अगले चौराहे पर तो भीड़ बेकाबू थी। पुलिस बेरिकेड्स लगाकर धकेल रही थी। ज्योति टॉकीज से यहां तक तो न जाने कितने पुलिस वाले मुझे घेरकर यहां तक लाए। बाहर देखो कितनी भीड़ है। उफ!’
उन सज्जन ने मुझे गौर से देखा कि कहीं कोई पुड़िया लेकर तो नहीं आया हूं तो बहकी-बहकी बातें कर रहा हूं। उन्होंने कांच से बाहर देखा। बाहर सब कुछ सामान्य था।

-‘अरे आज संडे कवर पर स्टोरी जो छपी है और देश मुझे किस तरह देख रहा है, यह घर से निकलने के बाद ही पता चला। खबरों के दीवाने पाठकों की इतनी भयावह भीड़ से गुजरकर बमुश्किल यहां तक आ पाया हूं। पांच मिलियन कॉपी का प्रभाव पहली बार अनुभव किया।’

अब उनकी समझ में आया। हम कल्पेशजी के खाली केबिन की तरफ देखकर खूब हंसे। वह किस्सा पूरे न्यूजरूम में खूब चला और सबकी फरमाइश पर मुझे वह सीन बार-बार सुनाना पड़ा कि आज मैं कैसे बचकर ऑफिस तक आया।

यह किस्सा मुझे याद आया रवीश कुमार पांडे की वजह से, जिनका एनडीटीवी बिक गया है और वे बाहर हो गए हैं। 27 साल की धूनी समेट दी गई है। वे अपने छाल, कमंडल, भूत, भभूत, झाड़ू, जड़ी-बूटी की रंगीन शीशियां उठाकर चले गए हैं। तीन साल से वे आए दिन कभी रेलवे, कभी एयर इंडिया को लेकर देश के बिकने की बात जिस ठीए पर बैठकर जोर-शोर से किया करते थे, वह ठीया शांतिपूर्वक बिक गया है, देश वहीं का वहीं है और उन्हें देख रहा है।

पत्रकारिता में अच्छे अभ्यास पर हर कोई नजर रखता है। कोई अच्छा लिख रहा है, कोई अच्छा बोल रहा है, किसी का खास प्रस्तुतिकरण, कोई विशेष शैली। सीखने के नजरिए से मीडिया में काम करने वाले ऐसे हर अभ्यास को गौर से देखते हैं।

जैसे लखनऊ के कमाल खान की पीटूसी। जैसे चौबीस घंटे की चैनली चकल्लस के पहले के दौर के विनोद दुआ और प्रणव रॉय के चुनावी विश्लेषण। एसपी सिंह की पत्रकारिता। हिंदी अखबारों में राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के लेखन और विश्लेषण वगैरह।

मैं रवीश की रिपोर्ट इसी भाव से देखा करता था। सामाजिक सरोकारों के मसलों पर जितना स्पेस एनडीटीवी पर दिखाई देता था, कहीं और नहीं। उनके विषय और प्रस्तुति दोनों ही आकर्षक हुआ करते थे। बेशक वे स्क्रीन पर थे, लेकिन वह एक शानदार और दक्ष टीम का काम था, जिस टीम के बाकी चेहरों के बारे में एनडीटीवी के साथी ही जानते होंगे। हमें नहीं पता कि उनके कॉपी राइटर, एडिटर, कैमरा पर्सन कौन थे?

एक जमाने में राजेंद्र माथुर नईदुनिया के संपादक रहते हुए साल में पाठकों के 60 हजार पत्र खुद छांटा-बीना करते थे। रवीश ने कहा कि एनडीटीवी में दर्शकों की डाक छांटते हुए ही उनका करिअर परवान चढ़ा। आप यह तय मानिए कि जब एक आदमी किसी क्षेत्र में शिखर पर पहुंचता है तो वह बहुतों को सीढ़ियाँ बनाकर और सीढ़ियों को तोड़ते हुए ही आगे बढ़ता है। ऊपर पहुंचकर मसीहाई के सिर्फ दावे होते हैं। पीछे पसरी हुई हकीकतें वही जानते हैं, जो भुक्तभोगी होते हैं।

रवीश प्रतिभाशाली हैं। उनकी लेखनी प्रभावी है। उनकी आवाज में आकर्षण है। कुल मिलाकर समकालीन टीवी एंकरों मंे उनकी खास पहचान बनाने लायक मसाला भरपूर था और सबसे बड़ी बात एनडीटीवी की नीतियों अनुरूप उन्हें कंटेंट गढ़ने का सेक्युलर पर्यावरण अनुकूल था।

मैंने उन्हें कई सालों तक अनियमित रूप से देखा। मैंने पाया कि वे वैचारिक रूप से एक सिरे पर ठहरे हुए हैं और दूसरे सिरे को गलत साबित करने को ही पत्रकारिता मान बैठे हैं।

साफ शब्दों में कहूं तो पिछले दो दशक में भारतीय राजनीति एक ही शख्स के इर्दगिर्द केंद्रित रही है और वो हैं-नरेंद्र मोदी। 2014 के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वे आजाद भारत के अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हुए, जिनके विरुद्ध तमाम सेक्युलर पार्टियां, सेक्युलर मीडिया, सेक्युलर एनजीओ, कवि, लेखक एकजुट होकर चौबीस घंटा हमलावर रहे हैं। कॉलम में, कोर्ट में, उन्हें कहीं नहीं छोड़ा गया। एकमात्र कारण था-गुजरात के दंगे।

राजनीति का यह व्याकरण रचते हुए इस तबके की आंखें केवल दंगे देखती थीं, अपनी सुविधा से गोधरा को छोड़कर, गोधरा को भुलाकर और वे सामूहिक रूप से पूरी शक्ति लगाकर दुनिया भर में यह चित्रित करते रहे जैसे संसार में दंगे केवल गुजरात में हुए हैं और बस अभी हुए हैं। और सिर्फ यही आदमी दोषी है। यह अल्पसंख्यक विरोधी है। अल्पसंख्यक केवल मुसलमान हैं, जो संख्या में 20 करोड़ हैं। वे निर्दोष हैं। वे भटके हुए हैं। अशिक्षित हैं। पिछड़े हैं। उन्हें ऐसी-वैसी नजर से मत देखिए। वे धरती के एकमात्र विक्टिम हैं। यकीन न हो तो सच्चर कमेटी की आयतें पढ़ लीजिए!

वे सोते-जागते जिस शख्स को टारगेट पर लिए रहे, छेड़ते-उकसाते रहे, उसने असीम धैर्य से इन सबका सामना किया, कभी उकसावे में आकर उनके स्तर पर नहीं उतरा। वह पार्टी की परिपाटी से नंबर वन की कुर्सी पर नहीं आया था। इसलिए वह अपनी चाल से गुजरात का चूल्हा-चौका संभाले रहा। भूकंप के बाद अपने पैरों पर खड़े गुजरात में अमिताभ बच्चन कुछ दिन गुजारने का गाना गाते रहे। गुजरात एक मॉडल के रूप में चर्चित हो गया।

2013 में वह बिना किसी शोर-शराबे के बीजेपी के गर्भगृह से एक नई भूमिका के लिए चुनकर निकला तो संगठित तबके की जमीन हिल गई। आजाद भारत में सबसे पुरानी चुनावी सभाओं की स्मृतियों को ताजा करते हुए वेदप्रताप वैदिक विस्मित होकर लिखते रहे कि पहली बार मैदान छोटे पड़ गए हैं। इतने लोग जुट रहे हैं। यह जुटाई गई भीड़ नहीं है। वह शख्स अपनी ही शैली में अपना काम करता रहा। उसने कभी पलटकर कुछ नहीं कहा।

मैंने पाया कि रवीश कुमार पांडे एक ही सिरे पर अटके हुए हैं। उनके शो में उठाए गए कई मसलों की हकीकत भी सामने आ चुकी है कि किस तरह बेबुनियाद विषयों, फेक खबरों को लेकर सरकार पर एक और प्रहार का मौका कैसे उन्हांेने लपका और पोल खुलने पर सॉरी कहने िलए कैमरे पर पलटकर नहीं आए।

वैश्विक प्रसार में वह भारत में उभरती एक नई राजनीतिक शक्ति का एक संगठित प्रतिरोध था, जिसके प्रतिसाद में बड़े पुरस्कार संभव हुए। एक अनुकूल पर्यावरण, जिसने दशकों तक सत्ता का मजा लूटा था। उनकी अपनी स्वाभाविक फालोइंग थी। मगर जब आप वैचारिक दृष्टि से एक सिरे पर अटके होते हैं तो आप एक पक्ष ही होते हैं, निर्णायक नहीं हो सकते। रवीश कुमार पांडे स्वयंभू निर्णायक की भूमिका भी अपने लिए शिरोधार्य कर चुके थे, जिनकी नजर में 2014 के बाद देश का बेड़ा गर्क हो चुका है।

तो दूसरा पक्ष वो करोड़ों लोग हैं, जो जमीन पर हैं और सबकी सब तरह की हरकतों और इरादों पर गौर करते हैं। खबर के हर एंगल पर जाने के लिए उनके पास एक रिमोट है और उससे ज्यादा ताकतवर मोबाइल है। आपकी सुई एक ही सिरे पर अटकी है और आपके दर्शक-पाठक दसों दिशाओं में 360 डिग्री पर घूमकर आपकी असलियत देख रहे होते हैं।

प्रभावशाली इंटरनेट की लहरों पर सुशांत सिन्हा और अजीत भारती जैसे जागरूक और निडर पत्रकारों ने रवीश की खबरों की कलई खूब खोली हैं। पिछले चारेक सालों में रवीश कुमार पांडे के चेहरे की चढ़ाई हुई चमक को उतरते हुए स्क्रीन पर ही सबने देखा। उनके शो उजाड़ होते गए, जिनमें गाने के लिए एक ही राग बचा था और कोई सुनना नहीं चाहता था या वे ही लोग सुनकर महफिल में गरमाहट बनाए थे, जिनके अलाव बुझ चुके थे।

राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में सक्रिय कलम और कैमराकार अक्सर इस गुमान में होते हैं कि पीएम या सीएम तक उनकी पहुंच है। उन्हें सब जानते हैं। उनका बड़ा असर है। देश उन्हें देखता है। कड़वी सच्चाई यह है कि देश किसी को नहीं देखता और देश अच्छे-अच्छों को देख लेता है!

रवीश कुमार पांडे के अनुसार देश में मीडिया को दबा दिया गया है। मीडिया का पतन हो गया है। वह बिक गया है। ऐसा वो तब तक अपने हर शो में खुलकर कहते रहे, जब तक कि उनके कैमरा-माइक-स्टुडियो सब बिक नहीं गए। उन्हें कभी किसी ने नहीं रोका। पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार, अजित अंजुम वगैरह भी गुजरात दंगों से लेकर शाहीनबाग के सर्कस तक अपने उसी एक अटके हुए सिरे से सब कुछ दिखाते रहे, उनके अनुसार देश देखता रहा और देश अब भी उन्हें देख रहा है, यूट्यूब पर, उसी एक अटके हुए वैचारिक सिरे से, जहां से यह दिव्य दर्शन होते हैं कि 2014 के पहले भारत भूमि पर त्रेतायुग था, सब स्वर्गिक था, सब अलौकिक था!

गोदी मीडिया एक एेसा गढ़ा हुआ मुहावरा है, जो शायद रवीश कुमार के मस्तिष्क से ही झरा। यह गोद 2014 के बाद का आविष्कार नहीं है। यह पहले भी बहुत हरी-भरी रही है। मैं मध्यप्रदेश से हूं और 1984 में संसार की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी इसकी राजधानी में घटी है, जहां 15 हजार लाशें कीड़े-मकोड़ों की तरह सड़कों पर गिरी थीं। यह निरक्षरों का शहर नहीं था।

यहां अखबार थे, अकादमियां थीं, विश्वविद्यालय थे। आज आपके सुर में सुर मिलाने वाले संपादक, ब्यूरो चीफ, लेखक, शायर, कवि, उपन्यासकार, नाटककार सब यहां तब भी थे। ढंग की दस किताबें किसी ने नहीं लिखीं। वे किसकी गोद में बैठे थे, जो एक भयानक हादसा बगल से छूकर गुजर गया और अरेरा काॅलोनी, प्रोफेसर कॉलोनी, चार इमली, 74-45 बंगलों में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा?

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