ऐसा सिर्फ “संन्यासी” राजा ही कर सकता है !

पंकज मुकाती

दिग्विजय यानी सभी दिशाओं को जीतने वाला। अपने नाम को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने सार्थक भी किया। जो कहा, उसे निभाया। उस रास्ते पर डटे भी रहे। 2003 के विस चुनाव में कांग्रेस की बड़ी हार हुई। दिग्विजय ने दस साल के संन्यास का ऐलान किया। दस साल सत्ता, दस साल का संन्यास। अनूठी जिद। हार की ऐसी जिम्मेदारी स्वीकारने वाले कम ही होते हैं। वो भी नेता।

पर दिग्विजय ने इसे भी निभाया। दस साल तक न चुनाव लड़ा, न संगठन में पद लिया। दस साल के संन्यास के बाद भी अपने लिए एक जगह बनाये, बचाये रखने से बड़ी जीत कोई हो ही नहीं सकती। वे कांग्रेस महासचिव के तौर पर फिर लौटे। प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस को लौटाया।संन्यासी का नए ओज के साथ सत्ता की तरफ लौटना उसके अपने साथियों को भी नहीं सुहाता। फिर संन्यास की तरफ धकेलने के सायास प्रयास में आवाज आई बड़े नेताओं को बीजेपी के गढ़ वाली सीटों से लड़ना चाहिए।

सीधे-सीधे ये दिग्विजयसिंह के लिए ही था। राजा ने चुनौती स्वीकारी। तीस साल से बीजेपी के गढ़ रहे भोपाल से अब दिग्विजय सिंह मैदान में हैं। राजगढ़ से वे आसानी से चुनाव जीत सकते हैं। निश्चित जीत को छोड़कर संदिग्ध की तरफ आखिर कोई क्यों जाएगा। पर अपनी बात के पक्के दिग्विजय ने ये चुनौती भी स्वीकार ली। वो भी बिना इस बात का इंतज़ार किये कि भाजपा से कौन उम्मीदवार है। राजगढ़ को भी आसान दिग्विजय सिंह ने ही बनाया है। 16 लोकसभा चुनावों में से 9 बार यहां कांग्रेस जीती है।

यानी परिणाम 56 फीसदी ही रहे। कुल नौ जीत में से सात के रणनीतिकार खुद दिग्विजय सिंह रहे हैं। दो बार दिग्विजय और पांच बार लक्ष्मणसिंह यहां से सांसद चुने गए। अपने हाथों तैयार की जमीन छोड़कर नया सृजन करने का साहस वही कर सकता है, जिसे सत्ता और संन्यास दोनों के बीच संतुलन साधना आता ऐसा हो।दिग्विजय सिंह के पहले शिवराज भी ऐसी राजनीतिक रणनीति से निपट चुके हैं। उमा भारती ने 2003 में शिवराज को राघोगढ़ में दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतरवा दिया था। शिवराज हार गए।

ठीक दिग्विजय सिंह जैसा मामला कैलाश विजयवर्गीय का रहा। इंदौर-2 की सुरक्षित सीट से उन्हें कांग्रेस के गढ़ वाली महू भेज दिया गया। मात्र दो हफ़्तों में विजयवर्गीय वो किला फतह करके लौटे। ऐसा ही पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के साथ हुआ। उन्हें दिल्ली से टिकट दे दिया गया। वे भी जीतकर संचार मंत्री बने। सुरक्षित सीट छोड़कर पार्टी के लिए चुनौत्ती की खड़ाऊ पहनने वाले त्यागी नेता अब कुछ ही शेष हैं। जो ये चुनौती स्वीकारते हैं वे ही सम्मान के हकदार होते हैं… समर शेष है। ..

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