महाराज का काम ख़त्म…सिंधिया समर्थकों की हार की आशंका, भाजपा ने बनाई ‘गद्दारों’ को ठिकाने लगाने की रणनीति

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भाजपा के अभियान से ज्योतिरादित्य बेदखल

भाजपा ने चुनावी रथ के बाद स्टार प्रचारकों औरअब संकल्प पत्र में भी नहीं दी सिंधिया
के चेहरे को तवज्जो, शिवराज झोला भरकर बिना महाराज बहुमत जुटाने निकल पड़े

इंदौर। जैसे कि तय था, वही हुआ। मध्यप्रदेश में अब भाजपा के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया किसी काम के नहीं रहे। सिंधिया के जरिये सत्ता वापसी। फिर उनके समर्थकों के नखरे। सब कुछ भाजपा ने झेला। अब धीरे-धीरे भाजपा ने सिंधिया से पूरी तरह किनारा कर लिया। एक पंक्ति में कहें तो सिंधिया अब भाजपा के लिए यूज एंड थ्रो हो गए। अब अंदरखाने भाजपा खुद कह रही है -माफ़ करो महाराज।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के बिना भाजपा सरकार बनाने की रणनीति में चल रही है। इसलिए पहले निर्दलीयों को भाजपा में शामिल करवाया। अब कांग्रेस के विधायकों से इस्तीफा दिलवाया जा रहा है। निश्चित ही इसके पीछे कोई नेकनीयत तो है नहीं। सबसे बड़ी बात कांग्रेस के तेज़ प्रचार और जनता के विरोध से भाजपा को लगने लगा है कि चुनाव जीतकर सरकार बनाना मुश्किल है।

अभी भी भाजपा का दावा है कि वो तीन से चार और कांग्रेसी विधायकों के संपर्क में है। आखिर चुनाव के नतीजों के पहले ही बहुमत के लिए बाज़ार में जाने की इतनी हड़बड़ी क्यों ? खुद शिवराज कई मौके पर कह चुके हैं कि हार गए तो सब खत्म हो जाएगा। झोला लेकर जाना पड़ेगा। आम लोगों में एक जुमला चल रहा है-झोला लेकर सत्ता न छोड़नी पड़े इसलिए शिवराज झोला भरकर विधायक जुटाने निकल पड़े।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा ने बड़े तरीके से ज्योतिरादित्य सिंधिया को यूज किया। खुद सिंधिया भी ये समझ चुके हैं। इसलिए उन्होंने सभाओं में कहना शुरू कर दिया है कि न ये शिवराज का चुनाव है न भाजपा का ये मेरा चुनाव है। ये चुनाव सिंधिया लड़ रहा है। इसके मायने साफ़ है कि सिंधिया को भाजपा में तवज्जो नहीं मिल रही और अपनी हैसियत बनाने के लिए उनके समर्थकों का जीतना जरुरी है। जो अभी बेहद मुश्किल है।

सबसे पहले गद्दार और बिकाऊ के नारों से बचने के लिए भाजपा ने बड़े आयोजनों से सिंधिया को दूर रखा। इसके बाद चुनावी रथ में भी उनकी तस्वीर नहीं लगाई। तीसरा स्टार प्रचारकों की सूची में भी उन्हें दसवें नंबर पर रखकर उनकी हैसियत बता दी। अभी जो संकल्प पत्र भाजपा ने जारी किया उसमे भी कही सिंधिया की तस्वीर तक नहीं है। इससे ज्यादा किसी नेता की बेइज्जती क्या हो सकती है ? फिर भी वो भाजपा में बना रहे तो उसे क्या कहेंगे ?

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सिंधिया समर्थकों में हार का डर

भारतीय जनता पार्टी के बदलते रुख से सिंधिया समर्थकों में बड़ा डर हैं। वे मानने लगे हैं कि चुनाव जीतना बेहद कठिन हो गया है। कांग्रेस से उनके साथ समर्थक आये नहीं। भाजपा में बड़े पैमाने पर सिंधिया समर्थकों के खिलाफ माहौल है। वे ये भी समझ रहे हैं कि जब उनके आका ज्योतिरादित्य सिंधिया ही किनारे हैं तो उनका क्या होगा ?

सिंधिया की टीम भी तोड़ेगी भाजपा

भाजपा में सिंधिया समर्थकों के खिलाफ बगावत भी हो रही है। जो साथ दिख रहे हैं, वे भी पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं। भाजपा के अंदरखाने ये चर्चा है कि सिंधिया समर्थकों को हारने दिया जाए। उनके बिना ही सरकार बनाई जाए। जो कुछ समर्थक जीत भी जाते हैं, तो भाजपा ने प्लान बी के तहत उन्हें सिंधिया खेमे से अलग रखने की भी पूरी रणनीति तैयार कर ली है।

‘गद्दार’ से गद्दारी

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए पटकथा में जितना काम लिखा था, वो भाजपा ने पूरा करवा लिया। गद्दार और बिकाऊ नारे के शोर से भी भाजपा पीछा छुड़ाना चाहती है। शिवराज खुद कई मौके पर कह चुके हैं-कमलनाथ सरकार हमने नहीं सिंधिया ने गिराई। एक तरह से भाजपा को गद्दारों पर भरोसा नहीं उसे समझ आ गया कि इनकी गद्दारी की सजा हम क्यों भुगते। जनता के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए भाजपा सिंधिया और उनके समर्थकों से पूरी तरह से दूरी बनाने की तैयारी में है।

 

 


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