आईपीएस भट्ट को उम्रकैद, पर रथयात्री आडवाणी अब भी आज़ाद ?


 

सूचना – इस पूरी खबर को हिन्दू-मुस्लिम, राजनीति के चश्मे से न पढ़ें, सिर्फ और सिर्फ आम हिंदुस्तानी के तौर पर पढ़ेंगे तो देश के दर्द को समझ सकेंगे !
इंदौर। बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा अब भी ज़िंदा है। इस यात्रा के बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे हुए। सैकड़ों लोग मारे गए। कई परिवार उजड़ गए, कई उजाड़ दिए गए। इसके बाद राम मंदिर मामले ने तूल पकड़ा। बाबरी का ढांचा ढहा दिया गया। देश भर में उन्मादी जश्न हुए ,हजारों लोग मारे गए। इसमें हिन्दू-मुस्लिम और अन्य धर्मो के लोग भी थे। यानी इस रथयात्रा ने देश में एक हिंसा, उन्माद और कट्टरता का रास्ता तैयार किया। उसके बाद हिंदुस्तान पूरा बदलता चला गया। इसमें हिन्दू-मुस्लिम से ज्यादा राजनीति का दोष है। सबसे बड़ी बात जिस मुद्दे पर ये यात्रा निकाली गई थी, वो मुद्दा अब भी यात्रा में ही हैं, उसे मंज़िल नहीं मिल सकी। आडवाणी की इस यात्रा के बाद के एक मामले में गुजरात के एक पूर्व आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) संजीव भट्‌ट को उम्रकैद की सज़ा हुई है। जामनगर, गुजरात की अदालत ने पुलिस हिरासत में मौत के मामले में संजीव भट्‌ट और एक अन्य पुलिस अफसर प्रवीण सिंह झाला को यह सज़ा सुनाई है। यात्रा के बाद हुए दंगे में कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया था इसमें से एक की मौत होने के कारण ये सजा सुनाई गई है।

सबसे बड़ी बात ये है कि इस दंगे के पीछे का जो कारण है वो आडवाणी की यात्रा है। इस यात्रा के बाद सैकड़ों लोग मारे गए, पर इस यात्री को कोई सजा नहीं हुई क्यों ? आखिर कानून की ये गलियां कब तक कुछ लोगों को बचाती रहेगी। आप कानून वयवस्था में चूक पर अफसरों को सजा देंगे, पर कानून को हाथ में लेकर माहौल बिगाड़ने वालों को बख्श देंगे। ये भी कमाल है।

जज डीएम व्यास की अदालत ने संजीव भट्‌ट और प्रवीण सिंह झाला को हत्या के अपराध का दोषी माना है. इसीलिए दोनों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई है. इस मामले में अभी पांच अन्य आरोपित भी हैं. उनकी सज़ा का ऐलान होना बाकी है. संजीव भट्‌ट 1988 बैच के आईपीएस हैं. वे फिलहाल पालनपुर की जेल में न्यायिक हिरासत काट रहे हैं. उन पर एक अन्य आरोप ये भी है कि उन्होंने 22 साल पहले किसी को फंसाने के मक़सद से उसके ठिकाने पर मादक पदार्थ रखवाए थे.

हालांकि गुरुवार को जिस मामले में उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है वह 1990 का है. उस वक़्त संजीव भट्‌ट जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के तौर पर तैनात थे. उसी समय भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा निकाली जा रही थी. उसके चलते कस्बे में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे. तब संजीव भट्‌ट ने इस आरोप में 150 लोगों को हिरासत में लिया था. उन्हीं में से एक प्रभुदास वैष्णानी की हिरासत से छूटने के तुरंत बाद अस्पताल में मौत हो गई थी. उनके भाई अमृतलाल ने तब आरोप लगाया था कि पुलिस की पिटाई की वज़ह से प्रभुदास की मौत हुई है.


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