पहले हम सरकार चुनते हैं, फिर सरकार हमें !


33वें काव्य संग्रह ‘था थोड़ा लोहा भी था’ का लोकार्पण

कुम्भज ने पढ़ी कविता ‘पहले हम सरकार चुनते हैं’

इंदौर कीर्ति राणा

वामपंथी विचारधारा वाले कवि राजकुमार कुम्भज थोक में इतनी कविताएं कब लिख लेते हैं कि तीन साल से भी कम समय में 33वां काव्य संग्रह आ जाए।अपनी बेजोड़ कविताओं के कारण तो उनकी पहचान है ही, इंदौर जो उनके नाम से भी पहचाना जाता है तो उसकी एक बड़ी वजह है उनका पद्य के साथ गद्य में भी साधिकार और निरंतर लिखते रहना।और यही वजह भी है कि इतना अधिक लिखने, धड़ाधड़ मार्केट में काव्य संग्रह आने से साहित्य जगत में एक बड़ा खेमा ऐसा भी है जो उन से मन ही मन ईर्ष्या रखता है और अपनी इस डाह के चलते वह कुम्भज के लेखन को आसानी से नकारने की तत्परता दिखाता है।कुम्भज जैसा न लिख पाने वाले रचनाकर्मियों के लिए खुशी का बहाना भी यही रहता है कि उन्होंने कुम्भज के लिखे को नकारने का साहस दिखाया है।

हाल ही में उनका 33 वां काव्य संग्रह ‘था थोड़ा लोहा भी था’ प्रकाशित हुआ है।जिस तरह कवि नीरज बीमारी की हालत में भी माइक सामने आते ही तरोताजा हो जाते थे, कुछ ऐसा ही कुम्भज के साथ भी है।

पहले हम सरकार चुनते हैं

पहले हम सरकार चुनते हैं

फिर हमारी चुनी हुई सरकार चुनती है हमें

फिर वह हम में से ही किन्हीं और-और को

चुनती है तरह-तरह के आकार प्रकार में

फिर उन्हीं चुने हुए आकार-प्रकारों को

पहना कर अपने नाप की वर्दियां

हमारी चुनी हुई सरकार

लगा देती है हमारी सुरक्षा में

हमारी सरकार के

ये चुने हुए सुरक्षाकर्मी

सुरक्षा नियमों और सुरक्षा कारणों का

फिर देते हुए हवाला

हमारी जासूसी करने लगते हैं

वे, सरकार को करते हैं रिपोर्ट

कि हमने सुबह की चाय या कॉफी में

कितनी शक्कर का उपयोग किया?

वे सरकार को करते हैं रिपोर्ट

कि हमने दोपहर की दाल अथवा रोटी में

कितने नमक का उपयोग किया?

वे, सरकार को करते हैं रिपोर्ट

कि हमने रात के अंधेरे अथवा नींद में

कितनी रोशनी का उपयोग किया?


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