बे-साख मीडिया और किसानों का अपना अखबार ‘ट्राली टाइम्स’


 

मूलधारा या मेनस्ट्रीम का कहा जाने वाला मीडिया अपनी स्टीम (भाप की ताकत) खो चुका है, वह सरकार और बड़े कारोबार के दबाव और प्रभाव में कहीं झुका हुआ दिखता है, कहीं लेटा हुआ। ऐसे में किसानों ने आंदोलन स्थल पर ही अपना अखबार निकाल लिया ‘ट्राली टाइम्स’

 

सुनील कुमार (संपादक, डेली छत्तीसगढ़ )

दिल्ली के इर्द-गिर्द घेरा-डेरा डाले बैठे किसानों के बीच बुजुर्ग सिक्ख किसानों के चेहरे जैसे जीवट दिखते हैं। उनसे किसान तबके के संघर्ष का माद्दा भी दिखता है। सिक्खों का जुझारूपन भी। अभी पिछले दो-चार दिनों से वहां की तस्वीरों में एक टेबुलाईड अखबार पढ़ते लोग दिख रहे है। जिसका नाम ट्रॉली-टाईम्स है।

देश के स्थापित और बड़े मीडिया में अपने खिलाफ एक मजबूत सत्ता समर्थक पूर्वाग्रह देखते हुए इन आंदोलनकारियों ने अपना अखबार निकालना शुरू किया है ताकि अपने लोगों की खबर हो सके। यह दो भाषाओं में छप रहा है, और इसके दाम रखे गए हैं-पढ़ो और बढ़ाओ।

कुछ सिक्ख नौजवानों ने इसे निकालना शुरू किया है, और इसकी छपी हुई कॉपी पर लिए गए क्यूआर कोड से इसे फोन या कम्प्यूटर पर भी पढ़ा जा सकता है।

मूलधारा या मेनस्ट्रीम का कहा जाने वाला मीडिया अपनी स्टीम (भाप की ताकत) खो चुका है। वह सरकार और बड़े कारोबार के दबाव और प्रभाव में कहीं झुका हुआ दिखता है, और कहीं लेटा हुआ। जहां दबाव न भी रहे, वहां भी मीडिया के संगठित और कामयाब कारोबार को हवा में ऐसे दबाव की आशंकाएं दिखने लगती हैं, और उसे झुकने भी नहीं कहा जाता वहां भी वह मौका मिलते ही लेट जाने के फेर में रहता है। ऐसे में जमीनी हकीकत के मुद्दों को लेकर जब कोई आंदोलन लड़ाई लड़ता है, तो उसे इस किस्म की मौलिक कोशिश के लिए तैयार भी रहना चाहिए।

वैसे भी पूरी दुनिया में इंसाफ के लिए लड़ी जा रही लड़ाई को कारोबारी-मीडिया में जगह मुश्किल से मिलती है, या फिर उसे कुचलने के लिए की जा रही कोशिशें ही उस मीडिया में जगह पाती हैं। दुनिया भर में आंदोलनों को अपनी आवाज खुद ही गुंजानी पड़ती है, और आज का सोशल मीडिया इसमें उनके बहुत काम आ रहा है।

क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि सोशल मीडिया न होता तो किसानों के आंदोलन के इस अखबार की खबर उस छपे हुए अखबार की पहुंच के बाहर पहुंच पाती? आज भी पूरी दुनिया में आंदोलन और सामाजिक संघर्ष की तस्वीरें कारोबारी फोटो एजेंसियों के रास्ते ही दुनियाभर में फैलती हैं, और इन्हें खरीद पाना उन मीडिया-कारोबार के लिए ही मुमकिन होता है जो इन्हें अमूमन छापना नहीं चाहते।

मीडिया जैसे-जैसे एक बड़ा कारोबार बनता है, वह बड़े कारोबार के वर्गहित साझा करने लगता है। और बड़ा कारोबार हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में सरकार के रहमो करम का मोहताज होता है, और वही चरित्र मीडिया-कारोबार में भी आने लगता है।

इसलिए एक समानांतर मीडिया, एक वैकल्पिक मीडिया, एक जनकेन्द्रित मीडिया जरूरी है जो कि मीडिया के बड़े कारोबार से कभी नहीं निकल सकता। इसके लिए छोटे कारोबारी हितों या गैरकारोबारी कोशिशों की जरूरत होती है।

मीडिया में काम करने वाले लोगों से बाहर अधिक लोगों को यह जानकारी नहीं रहती कि किस तरह आज बहुत से लेखक, फोटोग्राफर, वीडियोग्राफर अपने काम को किसी भी तरह के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट पर डालने लगे हैं।

क्रियेटिव-कॉमन्स का लेबल लगी हुई सामग्री का मुफ्त में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि छोटे मीडिया कारोबार कभी भी बड़े फोटो-वीडियो कारोबार का भुगतान करने की हालत में नहीं रह सकते। लेकिन अभी भी यह कोशिश बहुत शुरूआती दौर में है।

संघर्ष का दस्तावेजीकरण जहां कहीं भी, जिस तरह से भी हो रहा है, उसे ऑनलाईन जगहों पर अधिक उदारता से डालने की जरूरत है ताकि छोटे मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते बात आगे बढ़ सके।

इसकी एक बड़ी कोशिश 2002 के गुजरात दंगों के बाद हुई थी जब उन दंगों को रिकॉर्ड करने वाले फिल्मकारों, वीडियोग्राफरों, और फोटोग्राफरों ने अपने काम को एक समूह बनाकर उसमें दे दिया था ताकि उसका अधिक से अधिक मुफ्त इस्तेमाल हो सके, और यह ताजा इतिहास दूर-दूर तक पहुंच सके।

लेकिन दूसरी तरफ आज अगर हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई, भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी, बांग्लादेश के निर्माण, भोपाल गैस त्रासदी, सिक्ख-विरोधी दंगे, बाबरी-विध्वंस, कश्मीर और उत्तर-पूर्व के आंदोलन, अमरीका के काले लोगों के आंदोलन, दुनिया भर से शरणार्थियों की आवाजाही, अफगानिस्तान, इराक, और सीरिया के युद्ध की तस्वीरें देखें, तो अधिकतर तस्वीरें कारोबारी फोटो एजेंसियों की दिखती हैं।

अब इतना भुगतान करके इनका कौन इस्तेमाल कर सकते हैं? इसलिए क्रियेटिव कॉमन्स के तहत मुफ्त इस्तेमाल के लिए लोगों को अपना अधिक काम पोस्ट करना चाहिए ताकि दुनिया भर के छोटे कारोबारी और अधिक सरोकारी लोग उनका इस्तेमाल कर सकें।

यह दौर इतिहास लेखन का एक अजीब सा दौर है। पहले भी इतिहास वही लिखा जाता था जो विजेता के नजरिए का होता था। आज भी इतिहास का बड़ा हिस्सा कामयाब के नजरिए से लिखा जाता है जो कि जिंदगी, दुनिया, और कारोबार की लड़ाई जीते हुए लोग हैं।

लेकिन यह अजीब दौर इसलिए है कि आज मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, और ऑनलाईन प्लेटफॉर्म तक इतिहास दर्ज करने की औपचारिक, संगठित, और अनौपचारिक, असंगठित कोशिशें चल रही हैं।

ऐसे में गैरकारोबारी वैकल्पिक मीडिया को बढ़ावा देने के लिए तमाम सरोकारी लोगों को हाथ बंटाना चाहिए। आज संचार तकनीक बहुत मामूली दाम पर सबको हासिल है इसलिए सरोकार की बात तो आगे बढ़ाना भी पहले के मुकाबले कम मुश्किल है।

ऐसे में सामग्री की कमी पड़ती है जिसे दूर करने के लिए फोटोग्राफरों, फिल्मकारों, वीडियोग्राफरों, और लेखक-संवाददाताओं को आगे आना चाहिए।

मौजूदा व्यवस्था पर तगड़ी मार करते हुए बहुत से कार्टूनिस्ट बहुत ताकतवर काम कर रहे हैं, उनको भी अपने काम का कम से कम एक हिस्सा मुफ्त इस्तेमाल के लिए घोषित करना चाहिए। जिस तरह वकालत के पेशे में जरूरतमंद तबके के कुछ मामलों को मुफ्त लडऩा प्रो-बोनो नाम का एक सम्मानजनक योगदान गिना जाता है, इस तरह बहुत से डॉक्टर अपना कुछ काम जरूरतमंद लोगों के लिए करते हैं, उसी तरह समकालीन दस्तावेजीकरण करने वाले तमाम पेशेवर और शौकीन लोगों को अपने काम का कुछ या अधिक हिस्सा सरोकारी-मीडिया या छोटे मीडिया के लिए समर्पित करना चाहिए ताकि बात आगे बढ़ सके।

 


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