‘श्रीमंत’ से मुक्ति, सहभोज और कांग्रेस में अनुशासन !
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‘श्रीमंत’ से मुक्ति, सहभोज और कांग्रेस में अनुशासन !

पंकज शुक्‍ला (सुबह सवेरे, मंडे मैपिंग)

मप्र की राजनीति चुनावी मोड में आ चुकी है। भाजपा के पास जहां मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसा आम आदमी से सीधा जुड़ा चेहरा है तो कांग्रेस में अभी चुनावी ‘चेहरे’ को लेकर अनिर्णय की स्थिति है। ऐसे में सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया अपनी पूर्ण सक्रियता से भाजपा सरकार को चुनौती देने में जुटे हैं। वे अपने हर ‘एक्‍ट’ से मुख्‍यमंत्री चौहान सहित पूरी भाजपा द्वारा किए जा रहे ‘महाराज’ के तंज को निर्मूल साबित करने में जुटे हैं। अभी बीते सप्‍ताह ग्‍वालियर में कार्यकर्ताओं के साथ हुआ सिंधिया का सहभोज चर्चा में है। यह महाराज की छवि को तोड़ने का उनका एक और जतन था। मगर इससे आगे जा कर यह कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अनुशासन लाने के उपक्रम के रूप में चर्चित हुआ।

कांग्रेस सांसद ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया बीते एक साल से मप्र में अत्‍यधिक सक्रिय हैं। उनकी सक्रियता के कारण वे अघोषित रूप से मप्र में कांग्रेस का प्रतिनिधि चेहरा बनते जा रहे हैं। इसी कारण भाजपा ने उनकी घेराबंदी कड़ी कर दी है। इस तथा पार्टी के अंदर के अपने विरोध को न्‍यून करने के लिए सिंधिया ने आम आदमी के करीब पहुंचने के हर जतन किए हैं। उनके लिए ऐसा करना समय की आवश्‍यकता है क्‍योंकि समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक ऐसे राजनेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो आम आदमी से सीधे जुड़ा है। वे स्‍वयं को प्रदेश के बच्‍चों का ‘मामा’ कहलवाना पसंद करते हैं। उनकी इस छवि के बरअक्‍स सिंधिया स्‍वयं को महाराज कहलाने से परहेज करने लगे हैं।

हालांकि, ज्‍योतिरादित्‍य की बुआ राजस्थान में भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को भी लोग ‘महारानी’ कह कर ही संबोधित करते हैं और उनकी दूसरी बुआ मप्र की खेल एवं युवा कल्‍याण मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया को भी श्रीमंत ही कहा जाता है मगर इस संबोधन का नुकसान ज्‍योतिरादित्‍य को ही अधिक हुआ। वे बार-बार कहते हैं कि महाराज न कहा जाए मगर कई हिदायतों के बाद भी बहुत सारे लोग सिंधिया को सामने देख कर स्‍वत: महाराज करने लगते हैं। बैनर, पोस्‍टर और होर्डिंग्‍स पर भी उनके समर्थक सिंधिया के नाम के साथ महाराजा विशेषण जोड़ना पसंद करते हैं। यह उनके प्रति अपनत्‍व का प्रतीक हो सकता है मगर वे इसे बड़ी बाधा मानते हैं। इन संबोधनों के विपरीत वे आम जनता के बीच सहज बने रहने की निरंतर कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी वेशभूषा में बहुत सरलता रखते हैं। क्षेत्र में गाड़ी का एसी उपयोग नहीं करते बल्कि खिड़की के शीशे खुले रखते हैं। यह प्रतीक है कि कोई भी क्षेत्रवासी उनसे सहज संपर्क कर सकता है। बीते माह अपने क्षेत्र में हुए दो विधानसभा उपचुनाव में वे घर-घर गए। ग्रामीण महिलाओं के साथ रोटी बेली। कभी बैलगाड़ी पर सवार हुए।

इसी क्रम में बुधवार 28 मार्च को सोशल मीडिया में समर्थकों ने सिंधिया के विशिष्‍ट होने की छवि को तोड़ती कुछ तस्‍वीरें पोस्‍ट की। ये तस्‍वीरें कोलारस और मुंगावली के आम कार्यकर्ताओं के साथ सिंधिया के सहभोज की थीं। इन तस्‍वीरों में वे कार्यकर्ता को भोजन की प्‍लेट देते हुए, उनके साथ खाना खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। एकबार फिर ग्‍वालियर राज परिवार ने लीक से हट कर कुछ किया और उनके आम होने की कोशिशों को राजनीतिक अर्थ मिल गए। इस भोज में ग्‍वालियर के कुछ कार्यकर्ता भी बिन बुलाए अतिथि की तरह शामिल हुए तो सिंधिया के निर्देश पर ऐसे कार्यकर्ताओं को बाहर कर दिया गया। इस कार्रवाई का विरोध भी हुआ मगर सिंधिया ने सख्‍ती बनाए रखी। कुछ समय पहले भोपाल में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में हुई पत्रकार वार्ता के दौरान भी सिंधिया ने स्‍वयं दरवाजे पर खड़े हो कर कार्यकर्ताओं को वार्ता कक्ष से बाहर करवाया। ऐसे समय में जब कार्यकर्ताओं का उत्‍साहित हो कर अनुशासन तोड़ना सुर्खियां बनता है सिंधिया का सख्‍ती से निर्देशों का अनुपालन करवाना कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अनुशासन लाने के प्रयत्‍न हैं। उनके ये प्रयास कितना सफल होते हैं यह और बात है मगर इस तरह वे कांग्रेस को संजीवनी देने का आभास जरूर देते हैं। अपनी कथित सामंती छवि से बाहर निकालने की कोशिशों के साथ कार्यकर्ताओं को अनुशासित करने के इस अंदाज की सफलता भविष्‍य की राजनीति की दिशा भी तय करेगी। लेकिन इतना तो तय है कि हावर्ड से अर्थशास्‍त्र में ग्रेजुएट सिंधिया की राह आसान नहीं है।

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