विधायकों की खरीदी के इस दौर में भाजपा बाबूलाल गौर से कुछ सबक सीखेंगी ?


 

स्मृति शेष…..बाबूलाल गौर प्रदेश के सबसे सक्षम और लौह मुख्यमंत्री में से एक, आज के भाजपाई नेताओं के लिए वेएक सबक की तरह हैं, जिन्होंने जीवन में कभी जाति कार्ड नहीं खेला न कभी विपक्ष को दुश्मन समझा

जयराम शुक्ल 

बाबूलाल गौर खुद को कृष्ण का वंशज मानते थे। संयोग देखिए कि हलषष्ठी के दिन उनके जीवन का अंतिम संस्कार हुआ। जब वे मुख्यमंत्री थे तब बलदाऊ जयंती मनाने का कार्यक्रम शुरू किया था, हलषष्ठी को बलदाऊ जी का जन्मदिन माना जाता है। गोसंवर्धन के लिए गोकुल ग्राम योजना आज भी लोगों को याद होगी।

गौर साहब यथार्थ के धरातल में जीने वाले ऐसे बेजोड़ नेता थे, जिनके बिंदास राजनीतिक जीवन और रिकार्डतोड़ जनाधार से उनके साथी और प्रतिद्वंदी भी रस्क करते थे। गौर साहब के सदाबहार रोमांटिक अंदाज पर दिग्विजय सिंह सबसे ज्यादा तंज कसते थे, तब जवाब वे कहते थे- सुन लो दिग्गीराजा मैं किशन-कन्हैया का वंशज हूँ मेरे भाग्य से ईर्ष्या मत करो।

गौर साहब जाति से ग्वाले(अहीर)थे। मुख्यमंत्री बनने पर यह खुलासा उन्हीं ने किया और उनका परिवार यूपी के प्रतापगढ़ जिले से भोपाल रोजी-रोटी की तलाश में आया था। यह मध्यप्रदेश की भूमि का प्रताप और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संस्कार था कि जमाने ने एक मजदूर को मुख्यमंत्री बनते देखा।
बाबूलाल गौर की राजनीति जिस दौर में चरम उत्थान पर थी वह अगड़े-पिछड़े और जातीय उद्भाव का समय था, लेकिन गौर साहब ने न तो पिछड़ों की राजनीति की और न ही उन्हें कभी यह सुहाया कि पिछड़ों के नेता के तौर पर उन्हें जाना जाए। बावजूद इसके कि वे उमाभारती के उत्तराधिकारी मुख्यमंत्री बने और शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें स्थानापन्न किया।

इनमें से अभी भी एक को लोधी और दूसरे को किरार की जातीय पहचान के साथ जाना जाता है..और वह इसलिए भी के ये दोनों अपने गाढ़े वक्त पर पिछड़ों की राजनीति का ट्रंप कार्ड अपने ऊपरी जेबों में रखते हैं।गौर साहब में सर्वस्पर्शी और समावेशी राजनीति के गुण श्रमिक राजनीति की वजह से मिले। बीएचईएल में भारतीय मजदूर संघ की राजनीति करते हुए वे राजनीति में खुद को ऐसे घोला जैसी कि मिश्री की डली पानी में घुलती है। जीवन की ऐसी विविधता शायद ही कहीं देखने को मिले जो गौर साहब में थी।यही वजह भी थी कि वे जीवन के आखिरी सांस तक जमीन से जुड़े अपराजेय राजनेता रहे, हर बार खुद की ही जीत का कीर्तिमान रचते हुए।

उम्र के पैमाने पर जब उन्हें मंत्रीपद से हटा दिया गया तो वे संभवतः जिंदगी में पहली बार इतने भावुक हुए और मीडिया को शायराना अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया दी-
हमें अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था,
मेरी किश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था।

गौर साहब को चाहने वालों के लिए यह वाकई व्यथित करने वाला क्षण था। एक बिंदास नेता जिसकी हर साँस में राजनीति उच्छ्वास करती है, जिसके ह्रदय में उसके क्षेत्र की जनता देवी-देवताओं की भाँति बसती है, उसे इस योग्य नहीं माना गया कि बल्लभभवन के दफ्तर में बैठकर काम कर सके..! जबकि उम्र के इस पड़ाव में भी उनका अंदाज युवाओं से भी युवा था।

पर गौर साहब तो गौर साहब, पल में तोला, पल में मासा। पार्टी के फैसले को नियति मान ली..और मंत्री पद से हटने के कुछ महीने बाद ही जंबूरी मैदान में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आमना-सामना हुआ, तो न कोई गिला, न शिकवा। वही ठहाकेदार अंदाज स्वागत करने का..। मोदीजी ने चुहल की..गौर साहब एक बार और..गौर साहब ने ठहाके के साथ जवाब दिया क्यों नहीं मैं तो हर क्षण तैयार..!

कम से कम मैं तो यह मानता हूँ कि यदि गौर साहब को विधानसभा में ग्यारहवां मौका मिला होता तो संभवतः वे हमारे बीच कुछ दिन और होते। आखिरकार राजनीति अनंत जिजीविषा का नाम है वह कभी बुढ़ाती नहीं, राजनीति अक्षतयौवना है, उसका समापन श्मशानघाट में ही होता.।राजनीति में बाबूलाल गौर न किसी के अनुगामी थे न ही किसी राजनेता की शैली का अनुशरण किया। उन्होंने खुद अपनी लकीर खींची, अपनी चौहद्दी तय की।

वह सन् 74 का दौर था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की हुंकार से देश का युवा उद्वेलित था। इसी बीच जबलपुर में लोकसभा और भोपाल दक्षिण की सीट से विधानसभा के उपचुनाव की स्थिति बनी। जबलपुर में सेठ गोविंददास का निधन हुआ था और भोपाल में इलेक्शन पिटीशन के फैसले के चलते सीट रिक्त हुई थी। इन दोनों उप चुनावों पर देश भर की नजर थी क्योंकि इनके नतीजों के आधार पर गैर कांग्रेसवाद की बुनियाद रखी जानी थी।

जबलपुर में तब के तूफानी छात्रनेता शरद यादव को विपक्ष का साझा उम्मीदवार तय किया गया और इधर भोपाल दक्षिण की विधानसभा सीट से मजदूर नेता बाबूलाल गौर। गौर जनसंघ से एक चुनाव लड़ चुके थे। जेपी आंदोलन में नानाजी देशमुख की अगुवाई में जनसंघ बढ़चढ़कर भाग ले रहा था। हवा इंदिरा गाँधी और कांग्रेस के खिलाफ थी। जबलपुर और भोपाल दोनों ही कांग्रेस के मजबूत गढ़ थे, इस चुनाव ने एक झटके में ही कांग्रेस के तिलस्म को तोड़ दिया।

यह इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ चुनावी लिटमस टेस्ट था, जिसमें साझा विपक्ष पास हो गया। फिर जल्दी ही जून 1975 आया। इंदिरा गांधी के चुनाव इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसले के बाद देश में आपातकाल लगा। सभी बड़े नेताओं की भाँति बाबूलाल गौर भी जेल में डाल दिए गए। पर इस उपचुनाव ने बाबूलाल गौर को राष्ट्रीय बना दिया था।

77 की मध्यप्रदेश जनतापार्टी सरकार अपने ही अंतर्विरोध में फँसी रही। तीन साल में तीन मुख्यमंत्री बने-बिगड़े। यह बाबूलाल गौर को स्वयं को गढ़ने का दौर था। इसका परिणाम सन् 80 में सामने नजर आया जब विपक्ष की बेंच से प्रदेश ने बाबूलाल गौर को गरजते-बरसते सुनना शुरू किया। इस एक दशक में विपक्ष की तिकड़ी में सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी और बाबूलाल गौर थे।

भोपाल से विधायक होना और ऊपर से श्रमिकों का नेतृत्व, गौर साहब की धार को निरंतर तेज करता गया।पटवा जी की तरह गौर साहब भी अर्जुन सिंह के अंतरंग मित्र थे, पर इस एक दशक में चुरहट लाटरी, आसवनी कांड और केरवा महल पर विधानसभा में जितने तेज हमले बाबूलाल गौर ने बोले उसके चलते वे भाजपा के हरावल दस्ते के स्वाभाविक सेनापति बनकर उभरे।

गौर साहब ने शायद ही कभी जोड़-तोड़ और लाबिंग पर भरोसा किया हो। इसलिए उन्होंने कभी भी खुद को मुख्यमंत्री की रेस में नहीं रखा। कद्दावर होने के बावजूद 90 में खुदको लो प्रोफाइल पर रखते हुए पटवा जी को अपने आगे रखा। सही मायने में पूछा जाए तो 90 से 93 के भाजपा शासनकाल को मुख्यमंत्री पटवा जी के नहीं अपितु बाबूलाल गौर के नाम से जाना जाता है। गौर ने मंत्री के तौरपर प्रदेश ही नहीं देश के सामने अपनी लौह छवि प्रस्तुत की, मीडिया की सुर्खियां बटोरी।

80 से 90 का दशक अर्जुन सिंह के नेतृत्व में वोटों के लिए कांग्रेस की परमतुष्टीकरण की राजनीति का दौर था। झुग्गियों को पट्टा, एक बत्ती कनेक्शन की घोषणा ने रातोंरात समूचे प्रदेश को स्लम में बदल दिया। विद्युतमंडल देखते ही देखते कंगाल हो गया। ऐसे में जब 90 में भाजपा के हाथों सत्ता आई तो ‘हर खेत को पानी, हर हाथ को काम’ जैसे आदर्शवादी नारे से इतर यथार्थ में कुछ कर दिखाने की चुनौती सामने थी।

इस चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए स्थानीय निकाय मंत्री बाबूलाल गौर सामने आए। इसकी शुरुआत भोपाल से ही की। उस समय के पहले तक लिली टाकीज के पहले और बाद के भोपाल में एक विभेदक रेखा थी। गौर साहब ने इसे मिटाने की ठानी। और बुलडोज़र लेकर निकल पड़े। हर उन गलियों में नगरनिगम का दस्ता बुलडोज़र लेकर घुसा जहां पुलिस को भी घुसने में कई कई बार सोचना पड़ता है। गौर साहब के इस अभियान से हाहाकार मच गया। कांग्रेस तो विपक्ष में था ही भाजपा के नेता भी खिलाफत पर उतर आए।

अतिक्रमण और झुग्गियों की राजनीति पर गौर साहब का बुलडोज़र निर्बाध चलता रहा। नजीर प्रस्तुत करने के लिए एक नेता ने अपना ही शहर चुना जहाँ से उसे कल फिर चुनाव लड़ना है इससे बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है..पर गौर साहब ने यह दुस्साहस न सिर्फ भोपाल में किया इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, रायपुर सभी शहरों का हुलिया महीनों के भीतर ही बदलकर रख दिया। इस अभियान में गौर साहब ने अपने पार्टी के नेताओं की भी नहीं सुनी..इसी अनसुनी से उन दिनों यह बात मशहूर हो चली थी कि गौर साहब बहरे हो गए हैं।

गौर साहब काँटे से काँटा निकालना जानते थे। भोपाल शहर में जब उन्होंने बुलडोज़र चलवाया तो उसकी कमान दो मुसलमान अफसरों को सौंपी। उस समय भोपाल के कलेक्टर और निगमायुक्त दोनों ही यही थे। ऐसा लगता है कि राजनीति की कलाबाजियां और सार्वजनिक जीवन की अदाएँ दोनों ही उन्हें यदुकुल से मिले..जिसकी वे सगर्व घोषणा किया करते थे।अयोद्धा कांड के बाद पटवा सरकार गिरा दी गई। चुनाव हुआ तो अतिक्रमण और झुग्गियों पर बुलडोजर चलाने वाले बाबूलाल गौर प्रदेश में सर्वाधिक/कीर्तिमान मतों के साथ विजयी हुए।

गौर साहब ने सस्ती लोकप्रियता के लिए तुष्टिकरण के मिथक को तोड़ते हुए ऐसा कंटकाकीर्ण मार्ग चुना जिसे राजनीतिक सफतला की दृष्टि से संदिग्ध माना जाता है। गौर साहब की नीति और नियति दोनों साफ थी, इसलिए उनके नेतृत्व पर उनके मतदाताओं का अटूट विश्वास था। शहरों में भाजपा के पाँव जमाने और मध्यवर्ग को जोड़ने की शुरुआत गौर साहब ने की।

90-93 के दौर में गौर साहब मध्यवर्ग के हीरो बनकर उभरे। गौर साहब ने अपनी इच्छाओं का दायरा उतना ही बढ़ाया जहां तक पाँव ढ़कने के लिए चादर का छोर पहुँचे, इसलिए उन्होंने न कभी लोकसभा की टिकट चाही न ही केंद्र की राजनीति के बारे में सोचा..जबकि वे अपने समकालीन शरद यादव से बड़े ही थे। 93 से 2003 के कार्यकाल में उन्हें महज कुछ महीनों के लिए ही नेता प्रतिपक्ष की भूमिका मिली।

गौर साहब ने कभी भी पद को अपनी प्रतिष्ठा के साथ नहीं तौला, इसीलिए जगहँसाई की परवाह किए बगैर वे मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद शिवराजसिंह चौहान मंत्रिमंडल में मंत्री पद स्वीकार कर लिया। यद्यपि यह अपवाद नहीं था, 90-93 के दौर में यही कैलाश जोशी ने भी यही किया था। प्रशासन की दृष्टि से बाबूलाल गौर का लगभग एक वर्ष का कार्यकाल बेमिसाल था।

राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए एक यक्ष प्रश्न आज भी कौंधता है..कि उमा भारती के बाद जब इन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया और उस काल में प्रदेश की कानून व्यवस्था और प्रशासन अपेक्षाकृत बेहतर था तब ऐसी क्या आफत आन पड़ी थी कि इन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा?

नए भोपाल के आर्किटेक्ट कहे जाने वाले प्रतिष्ठित नौकरशाह एमएन बुच ने एक इंटरव्यू में कहा था- प्रशासन की दृष्टि से मुझे यदि प्रदेश के अबतक के श्रेष्ठ मुख्यमंत्री चुनने को कहा जाए तो मेरे जेहन में सिर्फ़ दो ही नाम हैं एक अर्जुन सिंह और दूसरे बाबूलाल गौर। इनके मुकाबले अन्य कहीं दूर-दूर तक नहीं हैं। मैं अर्जुन सिंह के प्रशासन के बारे में सिर्फ़ सुना है पर एक पत्रकार के नाते बाबूलाल गौर को देखा है। उन्हें मैं अबतक का ऐसा विजनरी मुख्यमंत्री मानता हूँ जो अपने विजन को हर हाल यथार्थ के धरातल पर उतारकर ही दम लेता था।

गौर साहब राजनीति में आने वाली पीढ़ी के लिए…आदर्श नहीं, सबसे व्यवहारिक और यथार्थवादी उदाहरण के तौर पर अध्ययन के विषय बने रहेंगे।उनकी स्मृतियों को नमन्।


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