96 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला लक्षद्वीप इस समय चर्चा में है। यहां की परम्पराओं को बदलने की कथित कोशिश दिखाई दे रही है। इलाके में बीफ और शराब पर रोक के साथ गुंडा एक्ट लागू करने पर मामला गर्म है, इस एक्ट में किसी को भी बिना जमानत गिरफ्तार किया जा सकेगा। आखिर इस शांतइलाके में बदलाव की जरुरत क्यों ? क्या संघ यहां भी अपना एजेंडा लागू करने पर आमादा है.

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी (वरिष्ठ पत्रकार )

लक्षद्वीप इन दिनों चर्चा में है। कारण है यहाँ के प्रशासक द्वारा आरएसएस के कथित एजेंडे को लागू करवाने के लिए किये जा रहे प्रयास। प्रशासक का कहना है कि वे लक्षद्वीप का विकास करते हुए उसे मुख्यधारा में जोड़ना चाहते हैं और लक्षद्वीप का विकास पर्यटन के लिए मशहूर मालदीव की तरह करना चाहते हैं।

वे यहां बीफ पर बेन, शराब नियंत्रण में ढील, गुंडा एक्ट लागू कराने और पंचायत चुनावों में दो ज्यादा बच्चोंवालों को रोकने के साथ ही विकास कार्य कराना चाहते हैं। यहां के प्रशासक के खिलाफ एनसीपी के प्रमुख शरद पवार प्रधानमंत्री को पत्र लिख चुके हैं।

केरल विधानसभा में 1 जून को लक्षद्वीप के प्रशासक द्वारा किए गए प्रयासों के विरोध में प्रस्ताव पारित हो चुका है और उसे भी केंद्र को भेजा जा चुका है। जबकि प्रशासक का कहना है कि लक्षद्वीप में विकास कार्यों के लिए अनंत संभावनाएं हैं।
लक्षद्वीप वास्तव में छोटे-छोटे द्वीपों का एक समूह है। जो कुल 32 वर्ग किलोमीटर में फैला है और वहां 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 65 हज़ार लोग रहते हैं। लक्षद्वीपवासियों में कोई आदिवासी आबादी नहीं है। वहां कभी बौद्धों का शासन रहा, फिर बाद में मुस्लिम समुदाय का वर्चस्व रहा।

इस द्वीपसमूह पर कभी पुर्तगालियों ने भी शासन किया था। यह भारत का सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश है। यह एक जिला भी है और यहां से संसद का एक प्रतिनिधि भी आता है। यह द्वीप समूह केरल हाईकोर्ट के अंतर्गत आता है और केरल के लोगों की भाषा यानी मलयालम ही यहां के लोगों की मुख्य भाषा भी है।

पहले लक्षद्वीप मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) राज्य का अंग हुआ करता था, लेकिन 1 नवंबर 1956 को जब राज्यों का पुनर्गठन किया गया था, तब इसे स्वतंत्र केंद्र शासित राज्य बनाया गया।

भारत के लिए यह द्वीप समूह सुरक्षा कारणों से भी महत्वपूर्ण है और नौसेना के युद्धपोतों की यहाँ स्थायी तैनाती भी है। जिस तरह कश्मीर भारत के लिए उत्तर में महत्वपूर्ण है वैसे ही यह द्वीपसमूह दक्षिण में भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

यहाँ भी कश्मीर की तरह मुस्लिम बहुल आबादी है। अभी वहां से लोकसभा के सदस्य हैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मोहम्मद फ़ैजल और यहाँ के प्रशासक हैं प्रफुल्ल खोड़ाभाई पटेल, जो वास्तव में दादरा, नगरहवेली, दमन और दीव के प्रशासक हैं। लक्षदीप के तत्कालीन प्रशासक दिनेश्वर शर्मा के निधन के बाद दिसंबर 2020 में उन्हें लक्षद्वीप का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
मामला यह है कि प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ने जनवरी में लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन 2021 (LDAR) का मसौदा पेश किया था। लक्षद्वीप की 96 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। इसीलिए शायद वह राजनीति ज्यादा हो रही है।

हाल ही में वहां जो प्रशासनिक सुधार करने की कोशिश की गई, उसका भारी विरोध किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यह जो भी भी सुधार किए जा रहे हैं, वे लक्षद्वीप की संस्कृति के विरोध में है। लक्षद्वीप की संस्कृति इन बदलाव की इजाजत नहीं देती।

लोगों का कहना है कि जो कानून बनाए जा रहे हैं वे लक्षदीप की स्थानीय आबादी पर गैर लोकतांत्रिक तरीके से दबाव डालने के लिए हैं। लक्षद्वीप पशु संरक्षण विनियमन कहता है कि लक्षद्वीप में बीफ पर पूरा प्रतिबंध होगा और स्कूलों में मांसाहारी भोजन परोसा नहीं जाएगा।

लक्षद्वीप की 96 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। इन लोगों का कहना है कि बीफ ही हमारे लिए मुख्य भोजन है। और अगर यह कानून लागू हो गया तो यहां किसी भी मांसाहारी जानवर को मारना बेहद मुश्किल हो जाएगा। मांसाहार के लिए जानवरों को मारने के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट की जरूरत होगी, लेकिन गाय , बैल,बछड़ा के लिए इस तरह का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा।

बीफ या बीफ से बनी हुई चीजों को किसी भी रूप में रखने, बेचने या लाने ले जाने की अनुमति नहीं होगी। गोवंश की हत्या पर पांच लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकेगा और 10 साल तक की जेल की सजा भी हो सकेगी। लक्षद्वीप के लोगों का कहना है कि यह उनके रहने खाने-पीने संबंधी दिनचर्या का मामला है। स्कूलों में मिड डे मील में बच्चों को बीफ दिया जाता है तो यह गैरकानूनी होगा।
मसौदे के अंतर्गत प्रशासक को विकास के उद्देश्य से लक्षद्वीप की संपत्ति को जब्त करने और उसके मालिकों को वहां से हटाने का अधिकार प्रदान किया जाता है। इस कानून के तहत यह बात भी थी कि लक्षद्वीप के विकास से जुड़े कामों के लिए सरकार अचल संपत्ति के विकास को मान्यता दे सकती है।

इससे कई लोगों को यह डर लग रहा है कि हो सकता है कि इस कानून के लागू होने से उनकी जमीन छीन ली जाए या समुद्र के किनारे प्राइम लोकेशन की उनके प्रॉपर्टी सरकार अपने नियंत्रण में ले ले और क्षेत्र में पर्यटन के विकास को बहुत बढ़ावा देना शुरू कर दे। इससे पर्यावरण खतरे में पद सकता है।

इसके अलावा एक और कानून प्रस्तावित है – असामाजिक गतिविधियों को रोकने वाला प्रिवेंशन आफ एंटी सोशल एक्टिविटीज एक्ट। इस कानून में व्यवस्था है कि लक्षद्वीप का प्रशासन किसी भी व्यक्ति को बिना उसकी गिरफ्तारी का सार्वजनिक खुलासा किए 1 साल तक हिरासत में रख सकता है।

इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि सरकार असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम करने के लिए दृढ़ संकल्प है। इस कानून का भी विरोध इस यह कह कर किया जा रहा है कि लक्षदीप की अपराध की दर देश में सबसे कम है। ऐसे में यहां इतने कड़े कानूनों की कोई आवश्यकता है ही नहीं। यानी साधारण बोलचाल की भाषा में जिसे गुंडा एक्ट कहते हैं उसकी जहां कोई जरूरत नहीं है।

लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल का कहना है कि इस तरह के कानून इसलिए बनाए जा रहे हैं कि कोई भी व्यक्ति सरकार की मंशा के खिलाफ आंदोलन ना कर पाए। उसे गुंडा एक्ट के तहत गिरफ्तार करके डाल दिया जाएगा । पंचायत चुनाव अधिसूचना को लेकर भी लक्षद्वीप सुलग रहा है।

उस कानून के अनुसार सरकार किसी भी ऐसे व्यक्ति को पंचायत का चुनाव लड़ने से रोक सकती है जिसके 2 या उससे अधिक बच्चे हैं। इस तरह के कानून देश के कई राज्यों में है, जहां पंचायत चुनाव में 2 से अधिक बच्चों के माता-पिता को चुनाव लड़ने से रोका जाता है।

इन बातों के विरोध में केरल विधानसभा में एक जून को एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजा जा चुका है। इसके अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा है। पत्र में जिन 13 मुद्दों को उठाया है उनमें बीफ पर बेन, शराब से नियंत्रण हटाना, गुंडा एक्ट और विकास के नाम पर भूमि पर नियंत्रण के साथ ही कोरोना नियंत्रण के तरीके पर भी सवाल उठाया गया है।
केरल विधानसभा ने लक्षद्वीप के प्रशासक को वापस बुलाए जाने की मांग का एक प्रस्ताव पारित कर दिया है। केरल के मुख्यमंत्री ने विधानसभा में यह पहला प्रस्ताव रखा है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के अनुसार केरल और लक्षद्वीप के लोगों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं और जो परिवर्तन वहां किए जा रहे हैं वह लोकतंत्र को नष्ट करने की कोशिश है और इसीलिए इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार की आलोचना भी की गई है।

प्रस्ताव में कहा गया कि लक्षद्वीप में अपराध की दर असाधारण रूप से कम है। इसके बावजूद गुंडा एक्ट लागू करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। यहां के लोगों का प्राकृतिक आहार बीफ है। उसे लोगों के जीवन से बाहर करने की कोशिश की जा रही है। धीरे-धीरे यहां की संस्कृति को नष्ट करने का काम केंद्र सरकार कर रही है।
लक्षद्वीप में मचे बवाल का एक कारण यह है कि केंद्र ने वहां प्रफुल्ल पटेल को प्रशासक बना कर भेजा है। उनके पिता खोड़ा भाई पटेल राष्ट्रीय स्वयं संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक थे। प्रफुल्ल पटेल आईएएस अधिकारी नहीं हैं।

वे गुजरात के विधायक रह चुके हैं। प्रफुल्ल पटेल केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव के प्रशासक हैं। लक्षद्वीप के तत्कालीन प्रशासक दिनेश्वर शर्मा के निधन के बाद दिसम्बर 2020 में उन्हें लक्षद्वीप का, अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।

प्रफुल्ल पटेल ने गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में दो साल तक गृह राज्य मंत्री के तौर पर काम किया था। प्रशासक के रूप में प्रफुल्ल पटेल की नियुक्ति का विरोध किया गया । द्वीप के नेताओं ने आरोप लगाया था कि वह आरएसएस के सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं।

कहा जाता है कि वह लक्षद्वीप के प्रशासक के रूप में नियुक्त होने वाले एकमात्र राजनेता हैं। इस पद पर पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों का कब्जा रहा है।
लक्षद्वीप का विकास तो होना चाहिए, इसमें कोई दो मत नहीं। उसे मालदीव के पर्यटन केंद्रों की तरह विकसित भी किया जा सकता है। लेकिन स्थानीय हितों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। अगर वहां अपराध की दर देश में सबसे कम है तो अलोकतांत्रिक कानून क्यों लागू होना चाहिए?

छोटे छोटे द्वीपों पर हाइवे जैसी सड़कें बनाना कौन सी अक्लमंदी होगी? वहां की बहुसंख्य आबादी को भी मान लेना चाहिए कि वे भारत के अंग हैं और उन्हें मुख्यधारा में आने की ज़रूरत है। बीजेपी शासित गोवा में बीफ बेन नहीं है तो लक्षद्वीप में क्यों?


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