निमाड़ का रण…सिंधिया का दखल, भाजपा को भजन !


मप्र विधानसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका देने वाले निमाड़ में बीते पौने तीन बरसों में भी भाजपा की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। आदिवासी सीटों पर अस्सी प्रतिशत सीटें खो देने के बावजूद जमीनी हालातों में तब्दीली नजर नहीं आ रही है। पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ की राजनीति में सब कुछ चंगा-चंगा है, पर हकीकत में सिंधिया के दखल के बाद संगठन  कमजोर हुआ तो जनता भी खुश नहीं ऐसे भाजपा के हिस्से  इलाके से हरि भजन ..
मुकेश गुप्ता (शिक्षाविद)

पॉलिटिक्सवाला के गतांक में हमने आदिवासी संगठनों की सक्रियता के दूरगामी परिणामों का कच्चा चिट्ठा अपने पाठकों के सामने रखा था। इस रिपोर्ट पर संघ सहित जयस के बड़े नेताओं ने नजरें गढ़ाकर हकीकत को समझने-समझाने में रुचि दिखाई।

सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के लिये इस हकीकत से रूबरू होने का शायद अभी सही समय नहीं आया है, इसलिये पूरे निमाड़ क्षेत्र में भाजपा की वर्तमान स्थिति 2018 की स्थिति से कोई विशेष भिन्न नहीं है। सत्ता के प्रभाव में संगठन और संगठन के दबाव में जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज को गौण करने के तमाम हालात वैसे ही बन गये हैं, जैसे 2018 के पहले पंद्रह वर्षों की सत्ता के मद में हिलोरे खाते दिखाई देते थे।

एक और लहर इस डगमग चाल को अस्थिर करने को अपना प्रभाव दिखाने लगी है, वह है ग्वालियर के शाही खानदान के पूर्व कांग्रेसी नेता और वर्तमान में भाजपा के राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की दखलंदाजी। इस सबके चलते सत्ता के समर्थकों की फौज भले ही भाजपा के पक्ष में दिन रात व्हाट्सऐप युद्ध में सक्रिय दिखाई देती हो, किन्तु जमीन पर भाजपा का बल कमजोर होता दिखने लगा है।

केंद्रीय राजनीति में मोदी के प्रभाव ने निमाड़ की खरगोन-खंडवा दोनों लोकसभा सीटों पर भाजपा की भारी जीत दर्ज कराने में कोई कोताही नहीं बरती थी, किन्तु अब 2023 के चुनाव में 2018 को दोहराने की स्थिति ही बनती दिख रही है।

 

भाजपा के एक पूर्व संगठन मंत्री ने 2018 चुनाव के पहले भी इस क्षेत्र की ज़मीनी सच्चाई प्रदेश और केंद्रीय नेताओं के समक्ष रखते हुये कई विधानसभा सीटों से नये नेतृत्व को अवसर देने की सलाह दी थी, किन्तु डेढ़ दशक पुरानी प्रदेश की सत्ता, संगठन के पूर्व पदाधिकारी की सलाह भला क्यों मानती?

निमाड़ के विधानसभा परिणाम भाजपा की सत्ता पलटने में मददगार साबित हुये तब संगठन के कान खड़े हुये, लेकिन सत्ता के खिलाड़ियों ने सत्ता को ही पलट दिया। संगठन को मजबूत करने की बजाये संगठन को ही वो नये नेता सौंप दिये गये जो पुराने कांग्रेसी विधायक सांसद रहे हैं।

संदेश साफ था कि संगठन को सत्ता के पीछे चलना होगा। संदेश अब भी साफ है कि संगठन की डोर सत्ता के प्रभावशाली हाथों में ही रहेगी।

खरगोन जिला भाजपा की कार्यकारिणी में सिंधिया समर्थक और पुराने कांग्रेसी नेता बंशीलाल चौधरी की नियुक्ति ने यह साबित कर दिया कि सिंधिया की भाजपा संगठन में दखलंदाज़ी केवल ग्वालियर में ही नहीं, बल्कि प्रदेश के पश्चिमी छोर निमाड़ में भी रहेगी।

भाजपा के कई पुराने और जमीनी नेता राह तकते रह गये, किन्तु महीनों बाद घोषित हुई जिला टीम में जगह नहीं मिल पायी। सब फिर भी चुप हैं क्योंकि सत्ता मुखर है, सत्ता बलवती है, संगठन में भी सत्ता की चलती है।

भाजपा में यह नजारा नया भी नहीं है, हमने पूर्व खंडवा सांसद और प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे नेता को भी खंड-मंडल तक की नियुक्तियों में दखल करते देखा है। कस्बा पंचायत हो या नगरपालिका के पार्षद पद का उम्मीदवार तय करना हो, सत्ता का दखल स्पष्ट तौर पर दिखता रहा है।

जिला और मंडल इकाइयों में भाजपा के वर्तमान पदाधिकारियों की टीम संभवतया आगामी विधानसभा चुनावों तक यथावत ही रहने वाली है, इस लिहाज से रायशुमारी जैसी कवायदों का अवसर भी सबको मिलेगा ही।

लिहाजा सिंधियाजी के लोगों की आवाज आगामी विधानसभा चुनावों की दावेदारी में भी गूंजेगी ही। यह सिलसिला पश्चिम निमाड़ तक ही सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि पूर्वी निमाड़ में भी अपना असर दिखायेगा ही।

कमलनाथ सरकार के समय पूर्वी निमाड़ के खंडवा जिले के प्रभारी मंत्री तुलसी सिलावट रहे हैं और उस दौरान उनकी खासी सक्रियता खंडवा जिले में रही है। तब अतिक्रमण जैसे स्थानीय मामलों तक में मंत्री महोदय अपने-परायों का ठीक गणित लगाकर ही अधिकारियों को निर्देशित करते थे।

तुलसी सिलावट अब भाजपा सरकार के मंत्री हैं और मुख्यमंत्री चौहान की गुडलिस्ट में शामिल भी हैं। ऐसी स्थिति में सिलावट अपने नेता सिंधिया की गोटियां खंडवा जिले के संगठन में फिट ना करें, यह कैसे हो सकता है?

बुरहानपुर जिले की नेपानगर सीट से वर्तमान विधायक खुद ही कांग्रेस से भाजपा में आकर विधायक पद पर कायम हैं। उनके रहते नेपानगर की पूर्व विधायक अर्चना चिटनीस के लिये नेपानगर की राजनीति में भाजपा के पुराने नेताओं के लिये जगह बना संभव नहीं दिखता है।

बुरहानपुर जिला मुख्यालय तो पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री के राजनैतिक युद्ध का कुरुक्षेत्र रहा है। 2018 में बुरहानपुर विधानसभा सीट पर अर्चना चिटनीस से दमदार उम्मीदवार भाजपा को मिल नहीं सकता था, फिर भी वे हार गई।

यहां केवल एक निर्दलीय प्रत्याशी से अर्चना चिटनीस की हार नहीं हुई थी, बल्कि सत्ता ने संगठन का दुरुपयोग करते हुये “निष्ठा” को पराजित किया था। बुरहानपुर में भाजपा की हार को बीते पौने तीन वर्षों में भी ठीक से पढ़ने की कोई ईमानदार कोशिश भाजपा में नहीं हुई।

गत वर्ष विधानसभा उपचुनावों में निमाड़ की भी दो सीटों पर कांग्रेस के विधायक भाजपा के होने में सफल हो गये थे। इससे प्रदेश की सत्ता में भाजपा मजबूत हुई, किन्तु संगठन के स्तर पर एक ऐसी गांठ पड़ गयी, जिसमें यहां के भाजपा नेताओं का भविष्य ही कैद हो गया।

संगठन के लिये आयातित नेताओं से तालमेल जरूरी होकर भी बेहद कठिन हो रहा है और स्थानीय नेताओं के लिये मंच पर मुस्कराते हुये फोटो खिंचवाने के बाद पूरे समय मन मसोसकर जीने के अलावा कोई चारा नहीं है।

नेपानगर और मांधाता के उपचुनावों के परिणामों को “सत्ता के बदलाव” के रूप में देखने की भूल वही कर सकते हैं, जिन्हें सामाजिक और वैचारिक बदलाव से कोई सरोकार ना हो।

लेकिन सामाजिक सरोकार का ज़िम्मा उठाये जो संगठन भाजपा की रीढ़ बनकर हर बुरे दौर में समाधान खोजता रहा है, निमाड़ की भूमि पर वह भी भयानक पेसोपेश में दिखाई दे रहा है। भाजपा का संगठन सत्ता के आगोश में दिखाई देता है तो विचारधारा आधारित पार्टी अपनी सीमाओं को खुद ही समेटकर शून्य पर खड़ी हो जाती है।

ऐसे में निमाड़ की पृष्ठभूमि तक जाकर मूल संगठन को समझने की जरूरत अधिक हो जाती है। पूर्वी निमाड़ का इलाका महाराष्ट्र के निकटवर्ती क्षेत्र होने और विदर्भ से पुराना जुड़ाव होने के नाते इस क्षेत्र पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव भी पुराना ही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार के प्रारंभिक दौर में सबसे पहले विश्वविद्यालय केंद्रों को आधार बिंदु बनाकर कार्य का विस्तार किया गया, तब निमाड़ का बड़ा हिस्सा विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के अंतर्गत ही शिक्षा पा रहा था।

इस लिहाज से भी खरगोन-खंडवा लोकसभा क्षेत्रों में संघ का काम अन्य क्षेत्रों से अधिक गहन और प्रभावी होता गया। ज्ञातव्य है कि आज भी मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जितना गहन कार्य उज्जैन में है, उतना प्रदेश के अन्य हिस्सों में नहीं है। यह अलग बात है राजधानी और महानगरों की व्यवस्था के अंतर्गत संघ के मुख्यालय भोपाल, इंदौर और जबलपुर बनाये गये हैं, किन्तु संघ कार्य और विचार की सघनता का प्रमुख और प्रारंभिक आधार तो विश्वविद्यालय केंद्र ही रहे हैं।

निमाड़ और मालवा के सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-मिलाप को भी संघ ने अपने कार्य विस्तार में महत्वपूर्ण मानते हुये नागपुर से बहने वाली हवा को निमाड़ और मालवा में फैलाने का काम किया।

इन तथ्यों पर गौर करें तो समझना आसान होगा कि निमाड़ की सामाजिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि में संघ, जनसंघ और भाजपा की जड़ें बहुत गहरी और गहनता लिये हुये है।

बावजूद इसके निमाड़ की माटी में भाजपा अब कोई बहुत अच्छी पौध पाने में सतत सफल होती दिखाई नहीं देती है। इतनी ठोस पृष्ठभूमि पर अब ना तो वह मजबूती दिखाई देती है और ना ही वह गरिमा दिखाई देती है,

नौ आरक्षित सीटों में से भाजपा सिर्फ दो जीती
निमाड़ की कुल नौ अजजा आरक्षित सीटों में से 2018 में भाजपा का केवल दो सीटें जीत पायी थी, बावजूद इसके अभी भी भाजपा के पास ऐसे आदिवासी नेता का स्थान रिक्त ही पड़ा है जिसकी निमाड़ की भाजपा पर अच्छी पकड़ हो।

खरगोन के सांसद और प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष गजेन्द्र पटेल आदिवासी समाज के सुशिक्षित नेता हैं, किन्तु खरगोन भाजपा नेतृत्व से ही उनको अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता है। जमीन पर बेहद सक्रिय सांसद के रूप में पूरे संसदीय क्षेत्र में सम्मान पाने में सफल गजेन्द्र पटेल को निमाड़ भाजपा संगठन में वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार हो सकते थे।

कमोबेश ऐसी ही स्थिति निमाड़ की सामान्य विधानसभा सीटों की भी है जहां भाजपा की नींव खिसक गई, पर हल्ला बोल तम्बू तना हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में निमाड़ की सभी पांच सामान्य सीटों पर भाजपा बुरी तरह हार गई थी। बुरहानपुर, बड़वाह, कसरावद, खरगोन और मांधाता में से भाजपा को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी।

बावजूद इसके भाजपा में इन तमाम सामान्य सीटों पर ना तो कोई नया नेतृत्व खड़ा किया और ना ही अपने किसी पुराने निष्ठावान नेता को आगे कर के 2023 के लिये मजबूत जमीन बनाने की कोशिश प्रारंभ की।

हारी हुई सामान्य सीटों पर हारे हुये नेताओं को ही हार पहना-पहनाकर सजाने में भाजपा ने तीन वर्ष बीता दिये दिखते हैं। निमाड़ में भाजपा के पास कोई मजबूत नेतृत्व में ना तो सामान्य वर्ग में है और ना ही आरक्षित वर्ग में ।

मांधाता में भी खतरा
निमाड़ की सामान्य सीटों में से एक मांधाता सीट पर कांग्रेस के नेता नारायण पटेल को भाजपा विधायक के रूप में उपचुनाव में जीता लिया गया, किन्तु इस सामान्य सीट पर भी अंदर खेमे में असामान्य गृहयुद्ध मचा हुआ है, जिसकी बानगी लोकसभा उपचुनाव चुनाव में खुलकर देखने को मिलेगी।

आने वाले खंडवा लोकसभा उपचुनाव के परिणाम जो भी रहे, मप्र विधानसभा चुनावों में निमाड़ की राजनीति 2018 की पुनरावृत्ति करने की दिशा में बढ़ रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

यदि कोई राजनैतिक शक्ति निमाड़ की आदिवासी सीटों के साथ-साथ यहां की सामान्य सीटों पर अपनी ऊर्जा और कौशल का सामंजस्य स्थापित करनें में सफल हो जाता है तो आने वाले विधानसभा चुनावों में निमाड़ फिर से मप्र की राजनीति को मोड़ने में सफल हो जायेगा।

इस संभावना को हवा में उड़ाया नहीं जा सकता है, क्योंकि निमाड़ की राजनीति में भाजपा या कांग्रेस ही प्रभावी नहीं रह गये हैं, बल्कि विकास से वंचित निमाड़ क्षेत्र के युवा मप्र की राजनीति में स्थानीय दल की उपस्थिति को निमाड़ में जगह देने तक की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं ।