निमाड़ में तीसरा मोर्चा-खंडवा उपचुनाव के बहाने इलाके में जयस की ताकत का आकलन


 

मध्यप्रदेश के निमाड़ में किसी तीसरे मोर्चे के उभरने को भले भाजपा-कांग्रेस जानबूझकर अनदेखा करे, पर हकीकत में इस पूरे इलाके में आदिवासी युवा जयस के साथ खड़ा है। अंदरखाने इसकी तैयारी जोरो पर है, अगले चुनावों में ये मोर्चा दोनों बड़े दलों को कड़ी टक्कर देगा।

मुकेश गुप्ता (शिक्षाविद )

पाॅलिटिक्सवाला की रिपोर्ट के बाद निमाड़ के कई बुद्धिजीवी पाठकों में यह प्रश्न भी किया कि क्या निमाड़़ की राजनीति में और खंडवा लोकसभा उप चुनाव में किसी तीसरे दल या मोर्चा की संभावना नहीं है। इस विषय को हंसी-ठिठौली में उड़ाने या मजाक में जवाब देने जैसा नहीं माना जा सकता। इसलिए इस संभावना पर भी तथ्यपरक बिंदु पाठकों तक पहुंचाना जरूरी है।

तीसरे मोर्चे या पार्टी की संभावना को आगामी खंडवा लोकसभा के उपचुनाव की दृष्टि से शून्य माना जाये तब भी निमाड़ की राजनीति को इस संभावना से परे नहीं माना जा सकता है कि किस की शक्ति यहाँ के चुनाव परिणामों को प्रभावित करेगी ही।

इस जमीनी हकीकत को समझने के लिये हमें 2018 के विधानसभा चुनाव परिणामों को बारीकी से देखने की जरूरत है, खासकर निमाड़ के परिणामों को। शिवराज सरकार को सत्ता से हटाने में बड़ी भूमिका निमाड़ की उन आदिवासी सीटों की रही, जिनके बारे में भाजपा बड़े-बड़े दावे करते हुये अति आत्मविश्वास से भरी हुई दिखाई देती थी।

पश्चिम निमाड़ की खरगोन लोकसभा सीट की 5 अजजा सीटों में से भाजपा केवल एक सीट पर जीत हासिल कर पाई थी और पूर्वी निमाड़ की खंडवा लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली 4 में से तीन सीटें 2018 के चुनाव में भाजपा हार गई थी।

ऊपरी तौर पर इसे सत्ता के विरूद्ध या कांग्रेस के लिये अनुकूल माहौल करार दिया जा सकता है, किन्तु जमीनी हकीकत कुछ और ही है। झाबुआ से चल रही हवाओं में सुदूर भगवानपुरा और नेपानगर के आदिवासी खेड़ों तक कुछ नयी फिजा भर दी थी।

आदिवासी युवाओं के संगठन जयस की गतिविधियों ने पूरे पश्चिमी मध्यप्रदेश के गांव-गांव तक एक अंडर करंट फैला रखा था, जिसे जानने समझने में भाजपा का पूरा तंत्र असफल साबित हुआ था।

इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा और कांग्रेस ने इसे देर से ही सही पर चुनावों के पहले समझकर डॉ. अलावा को अपने पाले में करके चुनाव में बढ़त बनाने में सफलता पाई थी।

यह पिछले विधानसभा चुनाव की स्थिति थी, किन्तु वर्तमान की हालत भी कम गौर करने जैसी नहीं कही जा सकती है। जमीनी स्तर पर यही जयस फिर से पर्याप्त उर्जा से भरा हुआ सक्रिय होकर अपनी पैठ जमाने में लगा हुआ है। सत्ता की चकाचैंध इस जमीनी सच्चाई को स्वीकार करने को राजी ना हो तब भी शिक्षित आदिवासी युवाओं की इस क्षेत्र में सक्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

महेश्वर, कसरावद, अलीराजपुर, बड़वानी, पानसेलम, भगवानपुरा और सेंधवा में युवाओं की एक बड़ी मजबूत और सक्रिय फौज तैयार है, फिर से किसी बड़े राजनैतिक कदम के लिये। इन तमाम गतिविधियों का संचालन शिक्षित आदिवासी युवाओं के हाथ में दिखाई देता है जो न केवल कोचिंग क्लासेस के माध्यम से बल्कि रोजगार जैसे प्रभावशाली मुद्दों पर भी बेहद गंभीरता से दिन-रात लगे हैं।

2018 के चुनाव में केवल एक सीट पर समझौते से मान गये जयस को आगामी विधानसभा चुनाव में ना तो कांग्रेस और ना ही भाजपा कमतर आंक सकेगी। यह भी तथ्यात्मक बिंदु ही है कि जयस की पूरी युवा लॉबी हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर भाजपा के विरुद्ध ही दिखाई पड़ती है।

वर्तमान सत्ता के विरुद्ध बड़ी मुखरता से इस आदिवासी संगठन का युवा हर स्तर पर बोलता दिखाई दे रहा है। आमतौर पर आदिवासी समाज मौन रहने में विश्वास करने वाला समाज माना जाता है। मैंने स्वयं बड़वानी और खरगोन जिले के अनेक गांवों में इन आदिवासी युवाओं से संपर्क कर हकीकत समझने की कोशिश की।

अनेक युवाओं और उनके संगठन के कार्यकर्ताओं से चर्चा करने पर मैंने उन्हें हर मुद्दे पर बेहद मुखर पाया। युवा आदिवासियों की इस मुखरता और उनकी राजनैतिक जागरुकता ने मुझे बेहद प्रभावित किया। निमाड़़ का औसत नागरिक राजनैतिक मामलों में कम जागरूक माना जाता है, किन्तु आदिवासी समाज के युवाओं का यह बदलाव गौर-ए-तलब है।

‘माई का लाल’ जैसे बयान खुलेआम देने वाले राजनेताओें को सवर्ण समाज की राजनैतिक जागरूकता का अंदाजा रहा ही होगा, किन्तु अपने आदिवासी समाज के युवाओं की राजनैतिक समझ का अंदाजा अभी किसी राजनैतिक दल या विश्लेषक को शायद ही है।

आदिवासी समाज के युवाओं के संगठन की सक्रियता इन दिनों पश्चिम निमाड़़ की सीमाओं को पार करते हुये पूर्वी निमाड़ की सरहद में प्रवेश पा चुकी है। अपने खर्चे से चार पहिया वाहन में क्षमता से अधिक संख्या में बैठकर सुदूर गांव तक पहुंचने और समाज के हर एक टप्पर तक जयस का अभियान पहुंचाने का काम बिना किसी शोर-शराबे के अनवरत जारी है।

संघ की संस्था सेवा भारती सहित अनेक अनुषांगिक संगठनों की सक्रियता के बावजूद जयस के युवा उनकी वैचारिक परिसीमन में आ नहीं पा रहे हैं और पूरे माहौल के बावजूद हिंदू समाज का यह अभिन्न अंग हिंदुत्व की राजनैतिक परिभाषा को आत्मसात करने को राजी दिखाई नहीं देता है।

झाबुआ के दूर दूर फैले गांवों के साथ-साथ खेड़ों के चंद टप्परों तक ‘शिव गंगा अभियान’ के माध्यम से भगवा क्रांति लाने वाले प्रभावी प्रयास तो यहां उस ब्रिगेड के द्वारा होते दिखाई नहीं दे रहे, ऐसे में आदिवासी समाज को जयस की विचारधारा और सक्रियता से प्रभावित होना लाजमी प्रतीत होता है।

डॉक्टर अलावा के कांग्रेस में जाने और विधानसभा में कुर्सी पा लेने से जयस का युवा ना तो निराशा में दिखता है और ना दिशा भ्रमित, बल्कि पहले से ज्यादा जोश से भरे ये आदिवासी युवकों का यह दल किसी भी संचार माध्यम पर और अधिक मुखर ही दिखाई देता है।

अपने संगठन के लिये जयस के युवा सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी किसी अन्य दल से कम नहीं करते हैं और भाजपा की आईटी सेल की तुलना में उनकी आक्रामकता में कोई कमी भी नही दिखाई देती है। यही वह स्थिति है जो न केवल खंडवा, खरगोन लोकसभा क्षेत्रों में बल्कि झाबुआ के पूरे इलाके में भी वह तीसरी शक्ति या मोर्चा साबित होगी, जिसकी आज गिनती नहीं की जा रही है।

इस राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन को कम आंकने का परिणाम भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में भुगता ही है फिर भी यह कहना लाजमी ही है कि आज भी इस स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाया है।

कांग्रेस इस परिवर्तन की खामोश ‘आंधी’ को कितना अपने करीब लाकर लाभ उठा पायेगी, यह आज कहना आसान नहीं है फिर भी यह कहना जरूरी ही होगा कि जयस के युवाओं को फिर से एक बार ‘कम से संतुष्ट’ कर पाना कांग्रेस के लिये भी आसान नहीं होगा।

तीसरे मोर्चे के लिये निमाड़़ में अलग से जगह भले ना हो किंतु निमाड़ की बड़ी आबादी को राजनीति में प्रभावशाली बनाने के लिये किसी और की नहीं बल्कि उनके अपनों की ही विश्वसनीयता की जरूरतभर है, जिसके लिये वे पिछले विधानसभा चुनाव के अनुभव को बिना भूले ही बढ़ते दिख रहे हैं।

इसके अलावा आम आदमीं पार्टी भी खंडवा लोकसभा सीट पर 2014 के लोकसभा चुनाव में जोर आजमाइश कर चुकी है। नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेतृत्वकर्ता होने बावजूद आलोक अग्रवाल आंदोलन की सफलता के तुलनात्मक रूप संख्या में भी वोट नहीं बटोर सके।

इसके अलावा खलघाट क्षेत्र के उद्योगों में सक्रिय यूनियनों के आधार पर खड़े नेताओं की नर्मदा डूब क्षेत्रों के मुआवजे के लिये संघर्षरत ग्रामीणों के साथ सहयोगात्मक भूमिका को भी पश्चिम निमाड़ में पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

सरकार की नजर में ये बहुत छोटे स्तर के आंदोलन माने जा सकते हैं और स्थानीय विरोध को वहां के नेता व्यक्तिगत असुविधा के लिये ऊपर तक पहुंचाना भी नहीं चाहते हैं, किन्तु आंदोलन का प्रशिक्षण इन लोगों में संघर्ष का जज्बा जिंदा रखने में कामयाब होता तब ही दिखाई दे सकता है जब कोई इनके गांव तक पहुंचे पानी में खड़े लोगों की अंगुलियों को गलते हुये देखने के लिये वहां तक पहुंचने को राजी हो।

आप निमाड़ के अनेक युवाओं में उम्मीद की एक किरण के रूप में तो टिमटिमाती दिखती है किन्तु संगठन के व्यवस्थित स्वरूप के अभाव में उनकी मुखरता केवल सोशल मिडिया तक ही सिमित दिखाई देती है। सरकार के विरोध की आवाज को इस वर्ग का सहयोग भी कम नहीं माना जा सकता है। बुरहानपुर से लेकर सनावद तक हर कहीं एक समूह तो आम आदमी की टोपी पहने दिखता ही है।

बसपा पूरे निमाड़ में हर चुनाव में कमजोर होती जा रही है। कई विधानसभाओं में उसके बराबर वोटों की जुगाड़ तो सपाक्स ने कर ली है। आगामी चुनावों में मध्यमवर्गीय परिवार बेहद चैंकाने वाली भूमिका अदा कर सकते हैं। इस वर्ग की पीड़ा समझने के लिये किसी राजनैतिक सभा या आईटी सेल के व्हाट्सऐप ग्रुप की जरूरत नहीं है, बल्कि किसी किराना दुकान या सब्जी बाजार में होने वाली आम जिंदगी की अभिव्यक्ति को सुनने की जरूरत है।

आदिवासी क्षेत्रों में संगठित होते समाज की सक्रियता काबिल-ए-गौर है, इसे समाज के लिये जरूरी होने से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है। आम नागरिक महंगाई और अव्यवस्था से हर रोज आहत है, किसान बाहुल्य निमाड़ का किसान मौन रहकर भी बदलाव लाने में माहिर है।

इस सब से सत्तारूढ़ दल कैसे पार पायेगा, यह बड़ी चुनौती है जबकि कांग्रेस संगठन के बिखराव से परेशान है। तीसरी शक्ति खुद लोकसभा सीट जितने की हालत में नहीं है किंतु इसका अर्थ यह कतई नहीं समझा जाना चाहिए कि यह शक्ति चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं करेगी।

ऐसी स्थिति में भाजपा के पास किसी बड़े नेता को खंडवा उपचुनाव में उतारने के अलावा कोई ओर चारा नहीं है जबकि कांग्रेस के पास भाजपा की गलतियों को अपने हित में साध लेने के अलावा दूसरा कोइ रास्ता नहीं है।