मीडियाभाषा…निकहत या निक्हत लिखते तो सही होता ये निखत क्या है ?

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शब्दों का सफर के लेखक अजित वडनेरकर का मीडियाभाषा को बताता एक जरुरी लेख, सभी पत्रकारों को पढ़ना चाहिए

▪️एकबार फिर पत्रकारिता के अनपढ़ विद्वानों ने धूमधाम से अपना ब्रह्माण्डव्यापी अज्ञान प्रदर्शित किया। निज़ामाबाद की निकहत ज़रीन ने तुर्की में थाईलैंड की खिलाड़ी को मात देकर मुक्केबाजी का विश्वखिताब अपने नाम कर लिया। मगर दुनियाभर में हिंग्लिश का डंका बजाने वाले हमारे शीर्षस्थ अखबारों ने वर्ल्ड चैम्पियन को ‘निखत’ नाम दिया जिसका कोई अर्थ नहीं। निकहत को अरबी, फ़ारसी, उर्दू या हिन्दी किसी भी भाषा में ‘निखत’ लिखना गलत है। यह विशुद्ध बेपढ़-कुपढ़ होने की निशानी है।

▪️बीते तीन दशकों से तो ‘निखत उच्चार को लेकर आपका यह मित्र ही न्यूज़रूम में अपने कनिष्ठों से लेकर वरिष्ठों तक से माथाफोड़ी करता रहा है। हिन्दी पत्रकारिता में ‘निकहत’ को ‘निख़त’ लिखने-उच्चारने वालों में उन तथाकथित उर्दूभाषी मुस्लिमों का भी शुमार है जो अपने घर में हिन्दी बोलते हैं, जिसे वे उर्दू कह कर ख़ुश होते हैं और और शादियों के मौसम में अंग्रेजी में बुलव्वा छपवाते हैं।

▪️ख़ैर, बात निकहत की हो रही है। आमतौर पर डिक्शनरी न देखने की बीमारी से ही अखबारों में भाषा सम्बन्धी ग़लतियाँ होती हैं। रही सही कसर किन्ही हिन्दी सर्गों-पदों की वर्तनी रोमन में पढ़ कर पूरी हो जाती है। बॉलीवुड भी ऐसी रोमनोच्चार वाली हिन्दी चलाने का दोषी है। अगर बेचारे हिन्दी के सबएडिटर को पीटीआई, यूएनआई जैसी एजेंसियों की अंग्रेजी में लिखी खबर का अनुवाद करने को कहा गया है तो Nikhat लफ़्ज़ को पढ़ कर उसकी क्या मज़ाल जो उसमें से Ni और khat के अलावा कुछ और बीने?

▪️विरोधाभास यह भी कि प्रगतिशील पत्रकारों से भरे हमारे न्यूज़रूमों के भीतर मीर, ग़ालिब से लेकर फ़िराक़ तक पर बात होती है। कई सम्पादकों को उनकी शायरी कण्ठस्थ है। कई तो ख़ुद बड़े शायर हैं। दीवान छप चुके हैं। पर उनके यहाँ भी ‘निकहत’ ने नहीं, ‘निखत’ ने देश का नाम ऊँचा किया। इधर हिन्दी को हिंग्लिश बना चुके सम्पादकों ने नए पत्रकारों को यह सन्देश दिया कि उर्दू निकहत का हिन्दी संस्करण निखत है।

▪️निकहत मूलतः अरबी का शब्द है जिसके मूल में त्रिवर्णी क्रिया नाकाहा है जिसका आशय उच्छवास, साँस छोड़ना आदि है। इसी कड़ी में ‘नक्हा’ भी आता है जिसका आशय है सुगन्ध, बू, सुवास, श्वास, वास, महक आदि। उर्दू में निकहत, नकहत, निगहत जैसे रूप भी प्रचलित हैं। तमाम शायरों ने ये रूप बरते हैं। वर्तनी के नज़रिये से देखें तो नक्हत सबसे शुद्ध रूप है। इसका निक्हत रूप ज्यादा प्रचलित है और इसीलिए मान्य भी है। हिन्दी मे निकहत प्रचलित है। मगर अब Nikhat को निखत लिखा जा रहा है ।

▪️मज़े की बात यह कि अमृता प्रीतम और फिर गुलज़ार की सलोनी-रूमानी भाषा के अनेक उद्धरणों से अपनी लेखनी को सजाने वाले सृजनधर्मी पत्रकार भी ‘निखत’ जैसे प्रयोगों पर साथियों को टोकते नहीं। क्या निकहत, निक्हत जैसे रूपों से कभी उनका गुज़रना न हुआ? ‘निक्हत ए गुल’ तो इतना लोकप्रिय विशेषण है कि इसका प्रयोग अठारहवीं से लेकर इक्कीसवीं सदी तक प्रायः सभी नामवर शायरों के यहाँ मिलता है।

▪️अब ऐसे में शायरी, पत्रकारिता, भूगोल, इतिहास से अन्जान पत्रकार ब्रह्माण्ड के सबसे विशाल बीहड़ में फँस जाए तो बेचारा Nikhat के ‘Ni’ और‘khat’ को पकड़ कर निखत न बनाए तो और क्या करे? क्या करेगा? N I k h a t में से ‘निक्ह’ और ‘अत’ को अलग अलग बीनने की समझ तो पैदा होने से रही? जो हो सकता था वह यही कि किसी भी मुश्किल घड़ी में गुरुग्रन्थ साहब की शरण में जाया जाता है। मगर इतनी मेहनत भी कौन करे ?

▪️पत्रकारों के लिए डिक्शनरी का दर्जा ग्रन्थ साहिब का ही है। मगर वह तो सम्पादक जी की आलमारी को सुशोभित करता है। उसे उलटने-पलटने से पाप लगता है। निकहत जिसका आशय महक, खुश्बू, सुगन्ध, सुवास आदि है, उससे परिचित होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि मुमकिन है उपर्युक्त तमाम शब्दों की हिंग्लिश उसे न आती हो। इसलिए बेचारी निकहत ज़रीन अपने विश्वविजेता बनने की खबर को मढ़वाकर तो रख सकेगी किन्तु उसके सलोने नाम की गलत वर्तनी शायद उसके भीतर कहीं हमेशा किरकिराहट पैदा करती रहेगी।
▪️क्या शीर्ष अखबारों में शीर्ष वेतन लेने वाले तमाम सम्पादक इस चूक के लिए विश्वचैम्पियन निकहत से माफी माँगेगे ?
असम्पादित
#मीडियाभाषा

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