इतनी हार के बाद भी सुधरने, सीखने को तैयार नहीं राहुल गांधी


आखिर कश्मीर जाने की जिद क्यों ? दिल्ली में आवाज बुलंद करिये। कांग्रेस के सलाहकारों को सोचना चाहिए कि ये फैसला राजनीतिक रूप से कितना गलत साबित होगा

इंदौर। लगता है कांग्रेस राजनीतिक के साथ-साथ दिमागी रूप से भी दिवालिया हो गई है। ताज़ा मामला शनिवार का है। राहुल गांधी ने कश्मीर जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। क्या जरुरत है इस बेतुके अभियान के नेतृत्व की ? इससे दो बात साबित होती है। पहली या तो कांग्रेस के सभी समझदार नेताओं ने पार्टी के बारे में बोलना ही छोड़ दिया है। दूसरा बहुत संभव है कि राहुल गांधी ने किसी की सलाह लेते ही नहीं। वे मनमानी और जिद पर उतारू हैं। अपने इस्तीफे का कारण वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता बताना, फिर इस्तीफे पर अड़े रहने की जिद। दोनों ही बताता है कि वे नेतृत्व में अक्षम साबित हुए, पर वे इसे खुद पर लेने से बच रहे है। बहुत संभव है राहुल अब फ्री हैंड चाहते हो, पर कश्मीर जाने का फैसला यदि उनका अपना है। तब तो ये निश्चित ही उनकी राजनीतिक समझ पर भी सवाल उठाता है। ये फैसला फ्री हैंड नहीं मनमानी और नौसिखिया कहलायेगा। कश्मीर में 370 हटने के बाद पूरे देश में जो माहौल है उसको समझते हुए कांग्रेस को फैसले करने होंगे। क्या जरुरी है आप कश्मीर जाकर ही अपनी बात रखें ? दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में सवाल उठाईये। कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की व्यवस्था पर बात करिये। कश्मीर को देश से जोड़ने और वहां के व्यापार, शिक्षा पर यहीं से सरकार से सवाल पूछिए। कश्मीर से राहुल और उनकी टीम को श्रीनगर एयरपोर्ट से वापस भेज दिया गया। अब बीजेपी और दूसरे संगठनों के पास मौका होगा, राहुल के राष्ट्रवाद पर अंगुली उठाने का।

मालूम हो कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की अगुवाई में जम्मू-कश्मीर की स्थिति का जायजा लेने के लिए शनिवार को श्रीनगर एयरपोर्ट पहुंचे विपक्षी दलों के प्रतिनिमंडल को दिल्ली वापस लौटा दिया गया है। प्रशासन ने इस प्रतिनिधिमंडल के किसी नेता को एयरपोर्ट से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी जिससे वे सभी वीवीआईपी लाउंज में ही बैठे रहे। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद, सीपीआईएम के सीताराम येचुरी, सीपीआई के डी राजा, डीएमके के टी सिवा, आरजेडी के मनोज झा और टीएमसी के दिनेश त्रिवेदी भी शामिल थे.शुक्रवार को विपक्षी दलों के नेताओं के साथ एक बैठक करने के बाद राहुल गांधी ने जम्मू-कश्मीर जाकर वहां की जमीनी स्थिति जानने की घोषणा की थी. हालांकि उसके कुछ ही देर बाद स्थानीय प्रशासन ने वहां लगाए गए प्रतिबंधों और सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर उनसे अपना दौरा टालने की अपील भी की थी।  धारा 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के हवाईअड्डों से ही विपक्ष के किसी नेता को लौटाए जाने की यह पहली घटना नहीं है. इससे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए श्रीनगर के अलावा जम्मू एयरपोर्ट से भी लौटाया जा चुका है. उस दौरान भी कांग्रेस नेता को स्थानीय प्रशासन ने एयरपोर्ट से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी थी. वहीं डी राजा को भी इसी महीने श्रीनगर एयरपोर्ट पर इस स्थिति का सामना करना पड़ा था.


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