चीन के हमले पर मोदी देश को सच बताएं


 

भारत और चीन के बीच तनाव को लेकर दो दिन पहले हमने जब यहां लिखा था, उस वक्त भारत के तीन फौजियों के मारे जाने की खबर थी। फिर देर रात तक सरकार ने यह खुलासा किया कि 20 हिन्दुस्तानी शहीद हुए हैं। यह भी खबर आई कि गोलियां नहीं चलीं, और पत्थर-लाठियों से यह टकराव हुआ है। बात थोड़ी अजीब थी, लेकिन जंग के मोर्चे पर लोगों को अपने देश की सरकार से परे की जानकारी कम मिल पाती है, और मीडिया को भी अपने देश की फौज के रास्ते ही जानकारी मिल पाती है।

शुरुआती खबरों के मुकाबले बाद की हकीकत बहुत ही भयानक है, और हिन्दुस्तान हिल गया है। चीन की फौज को हुए नुकसान के बारे में वहां की सरकार ने कोई खुलासा नहीं किया है, लेकिन हिन्दुस्तानी फौज का कहना है कि उससे दुगुने लोग चीनी फौज के हताहत हुए हैं। फौजी जुबान में कैजुअल्टी यानी हताहत होने का मतलब बड़ा ही फैला हुआ होता है।

सैनिक की मौत से लेकर उसकी बीमारी या उसके जख्मी होने तक को इस एक शब्द हताहत में गिना जाता है, इसलिए भारत के मुकाबले चीन का नुकसान अभी साफ नहीं है, और चीन ने अपने एक भी सैनिक की मौत की घोषणा नहीं की है। ऐसे में यह सिलसिला थोड़ा सा अजीब लग रहा है कि सरहद पर इतनी तनातनी के बीच दो परमाणु-हथियार संपन्न देशों के बीच टकराव लाठियों और पत्थरों से हुआ।

आज एक भारतीय प्रतिरक्षा विशेषज्ञ ने भारतीय फौज के जब्त करके लाए गए जो हथियार दिखाए हैं, उनकी तस्वीर और भी हैरान करती है कि महीने भर से अधिक से चले आ रहे तनाव से निपटने के लिए, इतने टकराव के बाद क्या छड़ों में कीलें जोड़कर चीनी फौज लडऩे पहुंची थी? भारत सरकार बहुत रहस्यमय ढंग से बड़ी चुप्पी साधे हुए है, और जहां तक चीन का सवाल है वहां तो सब कुछ सरकार-नियंत्रित है, इसलिए वहां से कोई जानकारी सरकार से परे बाहर नहीं आ पाती।

अब हिन्दुस्तान के भीतर-भीतर की बात करें, तो 15-16 जून की मध्य रात्रि इतने भारतीय सैनिकों की शहादत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 जून की शाम एक सर्वदलीय वीडियो कांफ्रेंस करने जा रहे हैं। इतने हफ्तों से जो तनाव चल रहा था, उस पर देश उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री कुछ बोलेंगे।

अपने इन 6 बरसों में मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के साथ शायद डेढ़ दर्जन मुलाकात की है, और दोनों ने एक-दूसरे को अपने-अपने देश में अपने-अपने शहर में मेहमान बनाया हुआ है।

दोस्ताना संबंधों की इससे बड़ी नुमाइश आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई थी, लेकिन सरहद पर चल रहे टकराव के बीच यह कहीं पता नहीं लगा कि इन दोनों नेताओं के निजी दूतों ने भी कोई मुलाकात की हो, कोई बात की हो।

जबकि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पहले भी कुछ नाजुक मुद्दों पर बात करने के लिए चीन जा चुके हैं, और वे तब्लीगी जमात से लेकर दूसरे देशों तक केन्द्र सरकार की तरफ से कई किस्म की पहल करते आए हैं, जो कि एक सलाहकार की भूमिका से बढ़कर भी रही हैं। लेकिन चीन के इस पूरे मुद्दे से वे भी गायब रहे, प्रधानमंत्री ने 20 सैनिकों की शहादत हो जाने के बाद पहली बार इस मुद्दे पर मुंह खोला। नतीजा यह हुआ कि इस घोर अप्रिय नौबत का सामना करने के लिए प्रतिरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अकेले ही सामने रहे।

भारत के भीतर आम जनता को लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक दल तक भारतीय सैनिकों की इस तरह की मौत पर बहुत विचलित हैं। राहुल गांधी से लेकर दूसरे नेताओं तक ने सोशल मीडिया पर सरकार से कई तीखे और असुविधाजनक सवाल किए हैं।

इन सवालों को लेकर उन्हें गद्दार भी माना जा रहा है, लेकिन लोकतंत्र के फायदे के लिए यूपीए सरकार के वक्त की एक चीनी घुसपैठ के समय एनडीए के एक बड़े प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का एक वीडियो आज जिंदा है और तैर रहा है जिसमें वे सरकार से संसद और देश के सामने तथ्य रखने और जानकारी देने की मांग कर रहे हैं। उनके पूरे बयान को टाईप करके अगर उनका नाम हटा दिया जाए, और तारीख हटा दी जाए, तो आज भी वह पूरा बयान मोदी सरकार से एक सवाल की शक्ल में जायज है, और केन्द्र सरकार को देश के सामने तमाम बातों को रखना चाहिए।

जिन लोगों को अपने पसंदीदा लोगों से अपने नापसंद लोगों के सवाल नहीं सुहाते हैं, और जो बड़ी तेजी से इसे देश के साथ गद्दारी साबित करते हैं, पूछने वाले की बुद्धि को चीनपरस्त कहते हैं, तो कभी एक पप्पू की अक्ल करार देते हैं, वैसे लोगों को यह समझना चाहिए कि फौज से जुड़ी हुई, सरहद से जुड़ी हुई हर बात राष्ट्रीय सुरक्षा की गोपनीय जानकारी नहीं होती है, बहुत सी जानकारियां आम जनता के साथ बांटने के लायक होती हैं, और किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को आम जनता को हकीकत से वाकिफ रखना भी चाहिए।

बहुत ही सीमित बातें ऐसी होती हैं जिनका राष्ट्रीय हित में गोपनीय रहना जरूरी होता है, और हमारी जानकारी में देश के किसी भी नेता ने ऐसी कोई जानकारी केन्द्र सरकार को मांगी नहीं है।

ऐसे में मोदी सरकार बहुत सी बातों के लिए विपक्षी दलों के मार्फत जनता के प्रति जवाबदेह है। और यह जवाबदेही किसी भी शक्ल में देश का विरोध तो दूर, सरकार का विरोध करार देना भी बड़ी नाजायज बात होगी। लोकतंत्र अगर अपने भीतर के देश के प्रति वफादार लोगों को बात-बात पर गद्दार करार देने लगे, तो वह लोकतंत्र के खात्मे की शुरुआत होती है।

किसी भी सरकार को चाहे वह देश की हो, चाहे किसी प्रदेश की, चाहे वह कोई म्युनिसिपल या पंचायत ही क्यों न हो, जवाबदेही उसे गलतियों और गलत कामों से बचाती है। आज भारत सरकार को अपने देश के भीतर लोगों की जिज्ञासा, लोगों की शंकाएं, इन सबको शांत करना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए जो गोपनीय पहलू हैं, उनकी आड़ लेकर आम जानकारी को भी आम जनता से दूर रखना लोगों के मन में कई किस्म के नाजायज शक भी पैदा करता है, जो किसी के हित में नहीं हैं।

सरकार को यह बात भी समझना चाहिए कि हिन्दुस्तानी जनता के कारोबारी हित, उसकी रोज की जरूरतें, उसके रोज के इस्तेमाल के सामान चीन से आकर बाजारों में पटे हुए हैं। भारत का बहुत सा मेन्युफेक्चरिंग तबका चीन के पुर्जों और कच्चे माल पर जिंदा है। ये तमाम सामान सरकार की नीतियों के तहत, सरकार की इजाजत से, और सरकार को टैक्स देकर लाए गए हैं। सरकार की चुप्पी बाजार को भी एक असमंजस से घेरती है, और ऐसे में देश का एक संगठित उपद्रवी तबका चीनी सामानों के बहिष्कार के फतवे को हिंसा की हद तक ले जाता है।

ऐसे में कानूनी ढंग से कारोबार करने वाले देश के लाखों लोग, और उनसे जुड़े हुए करोड़ों पेट खतरे में पड़ते हैं। भारत सरकार को तुरंत ही देश के सामने न सिर्फ अपनी बात रखनी चाहिए, बल्कि विपक्ष के मुंह से देश के अलग-अलग तबकों की बात सुननी भी चाहिए। बेहतर तो यही होगा कि सरकार भारत-चीन तनाव पर एक बयान दे, और उसके बाद विपक्ष की राय को सुनने का काम ही करे।


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