फेसबुक- लोकतंत्र का ‘सुपारी’ किलर

चुनावों में अब भाड़े के गुंडों की जगह भ्रमित करने का ठेका फेसबुक ने उठा लिया है, इस पर वही दिखता
है जो ‘सुपारी’ लेकर ख़रीदा जाता है।

सुनील कुमार (वरिष्ठ पत्रकार )

आज बहुत से लोग समाचारों के लिए सोशल मीडिया की तरफ देखते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर खबरें सबसे पहले आती हैं, टीवी और समाचार की वेबसाइटों से भी पहले।

लेकिन बहुत से लोग फेसबुक पर आने वाली जानकारी को खबरें मानकर उसी से अपना काम चला लेते हैं। अभी पश्चिम में हुई एक गंभीर रिसर्च में यह बात सामने आई है कि वहां रहने वाले लोग अगर मौसम में बदलाव की खबरों के लिए अगर फेसबुक पर भरोसा करते हैं, तो वे गलत जानकारियों से घिरने के खतरे में रहते हैं।

अमरीका की कॉर्निल यूनिवर्सिटी में अभी एक रिसर्च में पाया कि 99.5 फीसदी वैज्ञानिक एक बात पर एकमत हैं कि क्लाइमेट चेंज इंसानों का पैदा किया हुआ है। किसी भी निष्कर्ष पर इतने वैज्ञानिक शायद ही कभी एक साथ रहते हैं। लेकिन अगर फेसबुक पर जाएं तो वहां सच्चाई कुछ और है।

वहां पर जलवायु परिवर्तन को लेकर पोस्ट की जा रही गलत जानकारियां इस कदर हावी हैं कि अगर कोई उनमें से कुछ बातों में दिलचस्पी ले, तो फेसबुक का एल्गोरिदम् उन्हें ऐसी ही दूसरी गलत जानकारियों से लाद देता है। फेसबुक का काम करने का तरीका यही है कि लोगों की दिलचस्पी जैसी बातों में हो, उन्हें वैसे ही बातें अधिक दिखाई जाती हैं।

अब अभी एक संस्थान ने एक प्रयोग किया, उसने दो अलग-अलग नामों से दो फेसबुक खाते खोले, एक में उसने पर्यावरण और मौसम-बदलाव से जुड़ी हुई सही जानकारी में दिलचस्पी दिखाना शुरू किया, और दूसरे खाते से इन्हीं मुद्दों पर झूठी जानकारी और अफवाह में दिलचस्पी लेना शुरू किया।

नतीजा यह निकला कि कुछ ही दिनों में सही देखने वाले को दूसरी सही जानकारियां दिखने लगीं, और गलत देखने वाले पर गलत जानकारियां लदती चली गईं। पर्यावरण को लेकर, वैक्सीन को लेकर, कोरोना और लॉकडाउन को लेकर, हिन्दुस्तान जैसे देश में गोमांस या बीफ को लेकर, मुस्लिमों को लेकर, फेसबुक तरह-तरह की झूठी जानकारी और पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है।

दुनिया की यह एक सबसे अधिक कमाने वाली कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर भरी हुई गलत और बदनीयत जानकारी को हटाने के लिए दिखावा जरूर करती है, लेकिन यह जाहिर है कि अंधाधुंध कमाई के बावजूद अगर वह गलत सूचना और दुर्भावना के विचार हटाने के लिए, नफरत और हिंसा हटाने के लिए काफी कुछ नहीं कर रही है, तो उसका मतलब यही है कि वह काफी कुछ करना नहीं चाहती है।
आज फेसबुक का इश्तहारों का बाजार इस बात पर नहीं टिका है कि उस पर पोस्ट करने वाले, उसे पढऩे वाले या उस पर सक्रिय लोग बेहतर इंसान हैं या नहीं। विज्ञापन देने वालों को सिर्फ गिनती से मतलब रहता है कि कितने लोग फेसबुक पर कितनी देर सक्रिय हैं, और वे कितने इश्तहारों के सामने पड़ते हैं।
इसलिए जब फेसबुक यह पाता होगा कि नफरत या झूठी जानकारी को लेकर लोग अधिक सक्रिय रहते हैं, और झूठी जानकारी पाने वाले लोग भी उस प्लेटफॉर्म पर अधिक वक्त गुजारते हैं, तो उसके कम्प्यूटरों का एल्गोरिदम् उन्हीं को बढ़ाने का काम करता होगा क्योंकि आखिरकार फेसबुक है तो कारोबार ही।

जो दो अकाऊंट खोलकर फेसबुक पर यह प्रयोग किया गया उससे यह बात भी सामने आई कि झूठ और गलत जानकारी में दिलचस्पी लेने वाले पर झूठ की बरसात सी हो रही थी, और उसके मुकाबले सही जानकारी पाने वाले को सीमित संख्या में ही सही जानकारी मिल रही थी।

मतलब यह कि जो पुरानी कहावत चली आ रही है कि जब तक सच अपने जूतों के तस्मे बांधता है, तब तक झूठ शहर का एक फेरा लगाकर आ जाता है। यह भी लगता है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता को बढ़ाने के लिए जो लोग शौकिया, या भुगतान पाकर यह काम करने वाले पेशेवर की तरह काम करते हैं, वे समझदारी की और अहिंसा की बातें करने वालों के मुकाबले बहुत अधिक सक्रिय रहते हैं, और झूठ के मुकाबले सच के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं।

आज फेसबुक की पकड़ और जकड़ भयानक रफ्तार से फैलने वाली जंगली घास की तरह हो गई है जो कि दूसरी फसल के लिए जगह नहीं छोड़ती है। आज लोगों की जिंदगी में सामाजिक अंतरसंबंधों का जो समय है, उसका एक बड़ा हिस्सा फेसबुक ने कब्जा रखा है, और वह अगर लापरवाही से, या कि सोच-समझकर लोगों को एक तरफ मोड़ रहा है, तो वह लोगों की लोकतांत्रिक और मानवीय सोच को अपने कारोबारी फायदे के लिए, और अपने किसी बड़े ग्राहक के राजनीतिक या साम्प्रदायिक फायदे के लिए उसी तरह मोड़ रहा है जिस तरह नदी की धार को एक नहर बनाकर उस तरफ मोड़ा जाता है।

फेसबुक के खतरे कम नहीं हैं, और अमरीका में अभी संसद के सामने इसके मालिक की लंबी पेशी हुई है, जिसमें वहां के सांसदों ने फेसबुक के गैरजिम्मेदार रूख के बारे में कड़े सवाल किए हैं।

अभी-अभी भारत में फेसबुक के बारे में यह रिपोर्ट आई है कि इसने 2019 के चुनावों के दौर में बाइस महीनों में हुए दस अलग-अलग चुनावों में भाजपा से विज्ञापनों का कम भुगतान लिया है, और दूसरे राजनीतिक दलों से अधिक भुगतान लिया है।
पत्रकारों की एक संस्था, द रिपोटर््र्स कलेक्टिव ने एक बड़ा रिसर्च किया है जिसमें उसने यह पाया है कि फेसबुक ने भाजपा, उसके उम्मीद्वारों और उसके सहयोगी संगठनों के इश्तहार जिस रेट पर दिखाए, कांग्रेस के इश्तहार उससे 29 फीसदी अधिक रेट पर दिखाए।
जिन लोगों को फेसबुक एक मासूम कारोबार लगता है, उन्हें यह बात समझने में दस-बीस बरस लग सकते हैं कि यह किसी देश के लोकतंत्र को, वहां की जनता की पसंद को प्रभावित करने का एक धंधा भी है, और यह सिर्फ चुनाव प्रभावित करने की मशीन नहीं है, यह नफरत फैलाने और हिंसा फैलाने का प्लेटफॉर्म भी है जिसे अंधाधुंध कमाई के बावजूद सुधारा नहीं जा रहा है।
रिपोर्टरों की इसी जांच-पड़ताल में यह बताया है कि फेसबुक ने भाजपा के एजेंडा को बढ़ाने वाले बहुत से दूसरे मुखौटाधारी विज्ञापनदाताओं को खूब बढ़ावा दिया, और उसने भाजपा की विरोधी पार्टियों और उनके उम्मीदवारों के मुद्दों को उठाने वाले वैसे विज्ञापनदाताओं को ब्लॉक करने का काम भी किया।

फेसबुक नाम का यह खतरा हिन्दुस्तानी चुनावों के इतिहास में बूथ पर कब्जा करने वाले गुंडों की तरह का दिखता नहीं है, लेकिन यह लोकतंत्र में जनता की सोच को प्रभावित करने का भाड़े का एक हथियार बन गया है जो कि मानो सुपारी लेकर काम करता है।

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