हे कृष्ण, कोरोना भूमि में जीवन-मरण को कैसे समझायेंगे !


 

सुबह अख़बारों, सोशल ,मीडिया अपर मज़दूरों की तस्वीरें, वीडियो देख कर लगा स्वंय अनुभव करा जावे,

इन्दौर से पिथमपुर तक की यात्रा में आम आदमी के दर्द, भूख भय को जैसा देखा वैसा ही बता रहे हैं विद्यापति उपाध्याय

INDORE. बायपास पर जाने वाली रोड जो पिथमपुर जाती है ख़ाली है उधर से आने वाली साइड,पर मेला लगा है ।पिथमपुर पूर्ण रूप से सामान्य , यातायात सुगम है , कारख़ाने अपनी गति से चल रहे है , भय का नामोनिशान नहीं है ।दुकानें बाज़ार चालू है ,इन्दौर माल ले जाने वालों पर सख़्त पहरा है पुलिस से अधिक ठेकेदार चिंतित है।लौटते है  नज़ारा बदला हुआ है ,वाहनों की क़तार है आटो रिक्शा , लोड़िग वाहन , कार टेक्सी , ट्रक , दो पहिया और इन सब से ज़्यादा ईश्वर के भक्त दो पाँव वाले ।
कोई भय नहीं , लक्ष्य अर्जुन से भी तीक्ष्ण,  घर पहुँचने की चाह । प्रत्येक वाहन मे क्षमता का कोई मापदण्ड नहीं जितने समा जाये। सामाजिक दूरी शब्द ?शायद हम डरपोकों के लिये है । राऊ चौराहा से देवास रोड़,अमरनाथ यात्रा के भंडारे सुने थे, शिव भक्त मॉ अहिल्या की नगरी में भी देख  लिए , हर स्टाल पर रोक-रोक कर आवाज़ लगा कर मालवी मनुहार कर , क्या कहें और क्या लिखे भाव के शब्द कम है ।

लस्सी , छाछ , ठंडा पानी , फल , भोजन, नहीं जम रहा आगे देख लो, कोई रोष नहीं,  सेवा समर्पण भाव । ग्लूकोज़ बच्चे के लिये रख लो, अरे आप के जुते फट गए लेलो, चप्पल भी रख लो, आगे काम आएगी ।समय ठंडा हो गया शबे मालवा का नशा और ही है तृप्त आत्मा को अब विश्राम की दरकार है , वाहन किनारे खड़े है, उपलब्ध साधन का बिछोना , निर्भय होकर एक सुनहरी ठंडी सुबह का ख़्वाब लिये सोना शायद सुखद कहना ठीक होगा ?किसी को शिकायत नहीं , हो तो कौन सुनता ,क्या यह सब प्रचार प्रसार नहीं समझते , कोरोना से नहीं डरते । डरते है ?हॉं, हॉं डरते है फिर जन्मभूमि की चाह , बच्चों का भविष्य , हम इतने अंतरयामी नहीं हो सकेंगे ।

पॉजिटिव, निगेटिव से यह सभी तन मन से ऊपर उठ चुके है,अब शायद जीवन मरण यह सर्वशक्तिमान के हाथ मे देकर निश्चित है ।यह दर्द बहुत गहरा है ।
आप को लगता है यह दो-चार सप्ताह के लॉक डाऊन से उबर के तत्काल काम पर लोट आएँगे । यह बारूद भर चुका है ।शेष भविष्य के गर्भ मे है , इन्हें नहीं छेड़ो तो अच्छा है ।


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