गद्दार राजा v/s वफादार वजीर .. जैसे सिंधिया गुना में हारे वैसे ही बदनावर में राजवर्धन के सामने खड़ी हुई मुश्किल


 

पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक )

बदनावर। बदनावर में मुकाबला एक राजा और वजीर के बीच हो गया है। एक वजीर जिसने आत्मसम्मान को चुना। बदनावर सीट पर मुकाबला अब सीधे-सीधे राजवर्धन सिंह दत्तीगांव और कमलसिंह पटेल के बीच है। पटेल राजवर्धन सिंह दत्तीगांव और उनके पिता प्रेमसिंह दत्तीगांव के चुनाव सलाहकार रहे हैं। बरसों तक वे बदनावर सीट की रणनीति तैयार करते रहे। इलाके में लोग अपने कामों के लिए कमलसिंह पटेल के पास ही जाते रहे हैं क्योंकि राजवर्धन सिंह अक्सर भोपाल या दिल्ली में रहते हैं।

इस इलाके की पूरी हवा ही एक सप्ताह में बदल गई। एक सप्ताह पहले तक राजवर्धन सिंह खुद को आसानी से जीता हुआ मान रहे थे। पर अब उनके चेहरे पर तनाव दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने प्रत्याशी बदलकर राजवर्धन की नींद उड़ा दी है। आम जनता भी कमल पटेल को अपने बीच का व्यक्ति मानकर अपना मन बदलती दिख रही है। अब मुकाबला महल और अपने सुख-दुःख के साथी के बीच का हो गया है।

कांग्रेस ने यहां से पहले अभिषेक सिंह बना को टिकट दिया था बाद में पटेल को टिकट दिया गया। इस बदलाव से दत्तीगांव हैरान हैं। सिंधिया के करीबी दत्तीगांव उनके ही साथ भाजपा में आये हैं। सिंधिया समर्थकों को गद्दार और शिवराज की नाकामी के चलते बेहद मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। सिंधिया प्रदेश में जिस एक सीट को लेकर निश्चित दिख रहे थे, अब उस बदनावर में भी गद्दार जोर पकड़ रहा है।

कमलसिंह पटेल इलाके के सभी गावों तक मजबूत पकड़ रखते हैं। जनता से उनका सीधा नाता है। राजवर्धन और उनके पिता के रणनीतिकार कमल सिंह पटेल राजवर्धन की कमजोरी और खूबी दोनों बखूबी जानते हैं। दूसरा कमल सिंह पटेल ने ये सन्देश में दिया कि राजा गद्दारी पर उतर आये तो उसके साथ हमें गद्दार नहीं बनना। इस वफादारी की इलाके में खूब चर्चा है।

कमलसिंह पटेल के वजूद से दत्तीगांव अच्छी तरह वाकिफ है। राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ने अब तक पांच चुनाव लड़े इसमें से दो वे हारे हैं। जो तीन चुनाव वे जीते हैं, इसके रणनीतिकार कमलसिंह पटेल रहे हैं। ऐसे में दत्तीगांव खुद को मुश्किल में देख रहे हैं।

बदनावर ने हमेशा ‘राजा’ के खिलाफ वोट किया

वैसे भी बदनावर ने हमेशा सत्ता विरोधी वोट किया है। यानी यहां कि जनता शिवराज के बजाय कमलनाथ पर भरोसा कर सकती है। 1984 की इंदिरा लहर में भी यहां के मतदाताओं ने भाजपा को जीता दिया था, वहीं 1989 की राम लहर में इस इलाके ने कांग्रेस प्रत्याशी पर भरोसा किया। पिछले विधानसभा चुनाव में भी इस इलाके ने शिवराज के खिलाफ वोट दिए। इस बार भी मतदाताओं की सोच बहुत बदली हुई नहीं दिखती।

सिंधिया को जैसे केपी यादव ने हराया वैसे ही
कमलपटेल राजवर्धन को हरा देंगे !

पिछले लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया केपी यादव से चुनाव हार गए थे। केपी यादव इस चुनाव के पहले तक सिंधिया परिवार के बेहद करीबी रहे। अपने अपमान से नाराज होकर वे भाजपा में गए और उन्होंने गुना लोकसभा सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनौती दी। सिंधिया केपी यादव से 1.25 लाख वोट से हार गए। ये भी एक राजा की मनमानी पर वजीर की जीत रही। बदनावर के मुकाबले को भी लोग इसी रूप में देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि जैसे सिंधिया को उनके वजीर ने पटखनी दी वैसे ही राजवर्धन को कमलसिंह पटेल परास्त कर देंगे।

कमल पटेल का अनुभव भारी
कमल सिंह पटेल कांग्रेस के एक अनुभवी नेता हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में मंडी से लेकर जनपद जिला पंचायत तक के चुनाव लड़े। 15 साल से कानवन में कांग्रेस पंचायत पर काबिज हैं। राजपूत समाज में कमल पटेल अच्छी पेठ रखते हैं। चामला पट्टी में व्यक्ति गत संबंध का फायदा इन्हें मिलेगा। कमल पटेल को क्षेत्र का प्रभावी नेता मान सकते हैं। उनके पुत्र वर्तमान में सरपंच हैं जो काफी लोक प्रिय माने जाते हैं। कमल सिंह पटेल ऐसा नेता हैं जो सरल-सहज स्वभाव के हैं और लोगों को आसानी उपलब्ध रहते हैं। वर्तमान में ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष हैं।

राजपूतों और पाटीदारों का वर्चस्व
इलाके में राजपूत मतदाता करीब 35 से 40 हजार हैं। पाटीदार करीब 40 से 45 हजार मतदाता हैं। 50 हजार आदिवासी मतदाता भी है। जबकि 15 से 18 हजार मुस्लिम मतदाता है। इसके अलावा जाट , सिरवी, यादव, माली, राठौर समाज के लोग यहां रहते हैं। बदनावर की पूरी राजनीति राजपूत और पाटीदार मतदाता के इर्द गिर्द ही घूमती है। यही निर्णायक मतदाता हैं और यही कारण है कि दोनों ही प्रमुख पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस राजपूत और पाटीदार प्रत्याक्षी चुनने में ज्यादा विश्वास रखती हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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