Explained Waqf Amendment Bill 2024 –
Waqf Amendment Bill 2024-दिल्ली। वक्फ संशोधन विधेयक पूरे देश में ही नहीं दुनिया में भी एक ट्रेंडिंग विषय बन गया है। सभी की निगाह इस तरफ लगी हुए है कि आखिर क्या होगा ये लागू हुआ तो और पूरी तरह नहीं लागू हो पाया तो। बहरहाल इन सभी चर्चाओं के बीच लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक 2024 (Waqf Amendment Bill ) पेश हो गया है। विधेयक पर आज ही चर्चा और वोटिंग कराने की तैयारी है। विपक्ष ने चर्चा के लिए 12 घंटे की मांग की। मगर सरकार ने सिर्फ 8 घंटे का समय दिया है।
सरकार जहां विधेयक को मुस्लिमों के हित में एक सुधारात्मक कदम बता रही तो वहीं विपक्ष पुरजोर विरोध में उतरा है। विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक संविधान का उल्लघंन है और धार्मिक आजादी के खिलाफ है। आईए हम जानते हैं वक्फ संशोधन विधेयक क्या है? वक्फ संपत्ति क्या है? और इतने वाद-विवाद का कारण क्या है?
सरकार के हिसाब से वक्फ संशोधन विधेयक का उद्देश्य पिछले अधिनियम की कमियों को दूर करना और अधिनियम का नाम बदलने, वक्फ की परिभाषाओं को अद्यतन करने, पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार करने और वक्फ रिकॉर्ड के प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ाने जैसे बदलाव करके वक्फ बोर्डों की दक्षता बढ़ाना है।
8 अगस्त, 2024 को लोकसभा में दो विधेयक, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 पेश किया गया था। जिनका उद्देश्य वक्फ बोर्ड के काम को सुव्यवस्थित करना और वक्फ संपत्तियों का कुशल प्रबंधन सुनिश्चित करना है। वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करना है, ताकि वक्फ संपत्तियों के विनियमन और प्रबंधन में आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
क्या है वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 का उद्देश्य
संशोधन विधेयक का उद्देश्य भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना है। इसका उद्देश्य पिछले अधिनियम की कमियों को दूर करना और अधिनियम का नाम बदलने, वक्फ की परिभाषाओं को अद्यतन करने, पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार करने और वक्फ रिकॉर्ड के प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ाने जैसे बदलाव करके वक्फ बोर्डों की दक्षता बढ़ाना है। मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 का प्राथमिक उद्देश्य मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923 को निरस्त करना है, जो औपनिवेशिक युग का कानून है और आधुनिक भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए पुराना और अपर्याप्त हो गया है। निरसन का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में एकरूपता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, इस प्रकार इस निरर्थक कानून के निरंतर अस्तित्व के कारण होने वाली विसंगतियों और अस्पष्टताओं को समाप्त करना है।
वक्फ और वक्फ संपत्ति
सबसे पहले ये जानते हैं कि आखिर वक्फ कहते किसे हैं। दरअसल, ‘वक्फ’ अरबी भाषा के ‘वकुफा’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है- ठहरना या रोकना। कानूनी शब्दों में समझने की कोशिश करें तो वक्फ उसे कहते हैं, ‘इस्लाम में कोई व्यक्ति जब धार्मिक वजहों से या ईश्वर के नाम पर अपनी प्रॉपर्टी दान करता है तो इसे प्रॉपर्टी को वक्फ कर देना यानी रोक देना कहते हैं।’ फिर वो चाहे कुछ रुपये हों प्रॉपर्टी हो, बहुमूल्य धातु हो या घर मकान या जमीन। दान की गई इस प्रॉपर्टी को ‘अल्लाह की संपत्ति’ कहा जाता है और अपनी प्रॉपर्टी वक्फ को देने वाला इंसान ‘वकिफा’ कहलाता है।
वक्फ संपत्ति-
-वक्फ मुसलमानों द्वारा धार्मिक, धर्मार्थ या निजी उद्देश्यों के लिए दी गई व्यक्तिगत संपत्ति है।
-वक्फ संपत्ति का स्वामित्व ईश्वर के पास माना जाता है।
-वक्फ को धार्मिक/धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए विलेख, साधन, मौखिक रूप से या दीर्घकालिक उपयोग के माध्यम से बनाया जा सकता है।
-एक बार वक्फ घोषित होने के बाद, संपत्ति का चरित्र स्थायी रूप से बदल जाता है, यह गैर-हस्तांतरणीय हो जाता है और हमेशा के लिए हिरासत में रहता है।
ये हैं वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित परिवर्तन
– विधेयक वक्फ बोर्डों के लिए अपनी संपत्तियों का वास्तविक मूल्यांकन सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टरों के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य कर देगा। देश में 30 वक्फ बोर्ड हैं और भारत में वक्फ बोर्डों के नियंत्रण में 9.4 लाख एकड़ में फैली 8.7 लाख संपत्तियां हैं।
– वक्फ अधिनियम की धारा 40 वक्फ बोर्ड को यह तय करने का अधिकार देती है कि कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं। बोर्ड का निर्णय तब तक अंतिम होगा जब तक कि इसे वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा रद्द या संशोधित नहीं किया जाता। विधेयक इस शक्ति को, जो वर्तमान में वक्फ न्यायाधिकरण के पास है, जिला कलेक्टर तक बढ़ाता है।
– वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 में परिषद में नियुक्त सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए मुस्लिम होने की आवश्यकता को हटा दिया गया है और यह अनिवार्य किया गया है कि दो सदस्य गैर-मुस्लिम होने चाहिए।
– सूत्रों के अनुसार, सभी वक्फ संपत्तियों से प्रति वर्ष 200 करोड़ रुपये का राजस्व उत्पन्न होने का अनुमान है, जो ऐसी संस्थाओं के पास मौजूद संपत्तियों की संख्या के अनुरूप नहीं है।
– विधेयक में कहा गया है कि “अधिनियम के लागू होने से पहले या बाद में वक्फ संपत्ति के रूप में पहचानी गई या घोषित की गई कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ संपत्ति नहीं मानी जाएगी।” हालांकि, यह निर्धारण कलेक्टर द्वारा किया जाना है, वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा नहीं।
– विधेयक में यह भी कहा गया है कि जब तक सरकार कोई निर्णय नहीं ले लेती, तब तक विवादित संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति माना जाएगा।
– वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव से इन संस्थाओं में महिलाओं को शामिल करना सुनिश्चित होगा।
– विधेयक में 1995 के कानून की धारा 107 को हटाने का भी प्रस्ताव है, जिसने सीमा अधिनियम, 1963 को वक्फ संपत्तियों पर लागू नहीं होने दिया था। सीमा अधिनियम व्यक्तियों पर एक निश्चित अवधि के बाद मुकदमा दायर करने पर एक वैधानिक प्रतिबंध है। इस प्रावधान ने सुनिश्चित किया कि वक्फ बोर्ड को अतिक्रमण से अपनी संपत्तियों को वापस पाने के लिए मुकदमा दायर करने के लिए 12 साल की वैधानिक समय सीमा तक सीमित नहीं किया जाएगा।
विधेयक पर विवाद क्या है?
वक्फ विधेयक पर विवाद मुख्य रूप से तब शुरू हुआ जब उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के अपने क्षेत्रीय दौरे के दौरान संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को बताया कि राज्य में वक्फ बोर्ड द्वारा दावा की गई 78% भूमि सरकार की है।
एनडीए के 14 संशोधनों के साथ जेपीसी द्वारा विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वक्फ बोर्ड राज्य में 1.27 लाख संपत्तियों के स्वामित्व का दावा करता है, लेकिन फ्रंटलाइन के अनुसार, जांच में केवल 7,000 वैध पाई गई हैं। उनका यह कथन कि सार्वजनिक संपत्ति राजस्व विभाग की है, संकेत देता है कि सरकार वक्फ बोर्ड से अन्य संपत्तियों पर दावों को छीनने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
1995 के अधिनियम में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त सर्वेक्षण आयुक्त द्वारा औकाफ (वक्फ का बहुवचन) का सर्वेक्षण निर्धारित किया गया है। संशोधन विधेयक सर्वेक्षण आयुक्त की जगह जिला कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा विधिवत नामित डिप्टी कलेक्टर के पद से नीचे का कोई अन्य अधिकारी नियुक्त करता है। सरकार ने यह बदलाव इसलिए किया है क्योंकि उसे पता चला है कि कई राज्यों में सर्वेक्षण का काम खराब रहा है। अधिकारियों ने बताया कि गुजरात और उत्तराखंड में अभी तक सर्वेक्षण शुरू नहीं हुआ है, जबकि उत्तर प्रदेश में 2014 में आदेशित सर्वेक्षण अभी भी लंबित है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने जेपीसी की कड़ी आलोचना की है और आरोप लगाया है कि यह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लोकतांत्रिक मानदंडों का उल्लंघन कर रही है। आलोचकों ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को नामित करने लेकिन उन्हें वक्फ बनाने या वक्फ को संपत्ति दान करने से रोकने जैसे प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। इसके अलावा उन्होंने अधिनियम के तहत निर्धारित परिभाषाओं में संशोधन के माध्यम से वक्फ और वक्फ प्रशासन की प्रकृति को बदलने पर भी आपत्ति जताई है।
विपक्ष ने मनमानी बताया –
विपक्षी सदस्यों ने 1995 के वक्फ अधिनियम में किसी भी बदलाव का विरोध करने के लिए विधेयक के सभी 44 खंडों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने विशेष रूप से धारा 9 का विरोध किया है, जो केंद्रीय वक्फ परिषद में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने की अनुमति देता है, और एक अन्य प्रावधान जो “उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ” की अवधारणा को हटाता है। जो लंबे समय तक धार्मिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाने वाली संपत्तियों को वक्फ संपत्ति के रूप में नामित करता है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने जेपीसी अध्यक्ष द्वारा कार्यवाही को संभालने की आलोचना की, इसे “मनमाना” कहा।
भारत में कब बना था वक्फ एक्ट
अब जानते हैं कि भारत में वक्फ की परंपरा कब शुरू हुई तो बता दें कि इसका इतिहास 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के समय से जुड़ा है और भारत में आजादी के बाद 1954 में पहली बार वक्फ एक्ट बना था और फिर साल 1995 में इस एक्ट में कुछ संशोधन किए गए थे। फिर नया वक्फ एक्ट बना और इसमें साल 2013 में भी कई बदलाव किए गए।
साल 2013 के बाद 8 अगस्त 2024 को लोकसभा में वक्फ एक्ट में संशोधन कर नया वक्फ बिल पेश किया गया, जिसके खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। विरोध के बाद बिल का ड्राफ्ट तैयार किया गया और इसे संसद की जेपीसी को भेज दिया गया, जिस पर चर्चा हुई और 27 जनवरी 2025 को जेपीसी ने बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी देकर सुझाए गए 14 संशोधनों को स्वीकार किया। इसके बाद 13 फरवरी 2025 को जेपीसी की रिपोर्ट संसद में पेश की गई। 19 फरवरी 2025 को कैबिनेट की बैठक में वक्फ के संशोधित बिल को मंजूरी मिल गई और अब आज यानी दो फरवरी को यह बिल संसद में पेश होगा, जिसपर 8 घंटे की बहस होगी और फिर इस पर वोटिंग होगी।
इसलिए हुआ वक्फ एक्ट में संशोधन
2022 से अब तक देश के अलग-अलग हाईकोर्ट में वक्फ एक्ट से जुड़ी करीब 120 याचिकाएं दायर की गईं थीं जिसमें मौजूदा वक्फ कानून में कई खामियां बताई गईं। इनमें से करीब 15 याचिकाएं मुस्लिमों की तरफ से हैं, जिसमें सबसे बड़ा तर्क यह था कि एक्ट के सेक्शन 40 के मुताबिक, वक्फ किसी भी प्रॉपर्टी को अपनी प्रॉपर्टी घोषित कर सकता है। इसके खिलाफ कोई शिकायत भी वक्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल में ही की जा सकती है और इस पर अंतिम फैसला ट्रिब्यूनल का ही होता है। आम लोगों के लिए वक्फ जैसी ताकतवर संस्था के फैसले के कोर्ट में चैलेंज करना आसान नहीं है।
याचिकाओं में पांच बड़ी मांगे
-भारत में मुस्लिम, जैन, सिख जैसे सभी अल्पसंख्यकों के धर्मार्थ ट्रस्टों और ट्रस्टियों के लिए एक कानून होना चाहिए।
-धार्मिक आधार पर कोई ट्रिब्यूनल नहीं होना चाहिए। वक्फ संपत्तियों पर फैसला सिविल कानून से हो, न कि वक्फ ट्रिब्यूनल से।
-अवैध तरीके से वक्फ की जमीन बेचने वाले वक्फ बोर्ड के मेंबर्स को सजा हो।
-सरकार को मस्जिदों से कोई कमाई नहीं होती, जबकि सरकार वक्फ के अधिकारियों को वेतन देती है। इसलिए वक्फ के आर्थिक मामलों पर नियंत्रण लाया जाए।
-मुस्लिम समाज के अलग-अलग सेक्शन यानी शिया, बोहरा मुस्लिम और मुस्लिम महिलाओं को भी शामिल किया जाए।
केंद्र सरकार ने कही ये बात
केंद्र सरकार का कहना है कि 2006 की जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर ही एक्ट में बदलाव किए जा रहे हैं। 8 अगस्त को लोकसभा में बिल पेश करते हुए संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था, ‘इस बिल का मकसद धार्मिक संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप करना नहीं है। बिल मुस्लिम महिलाओं और पिछड़े मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में हिस्सेदारी देने के लिए लाया गया है। इसमें वक्फ प्रॉपर्टीज के विवाद 6 महीने के भीतर निपटाने का प्रावधान है। इनसे वक्फ में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों का हल निकलेगा।’
लोकसभा और राज्यसभा में वोटिंग, क्या है नंबर गेम
संसद में वक्फ बिल को पास कराने के लिए सरकार को लोकसभा और राज्यसभा में वोटिंग के जरिए बहुमत की जरूरत है। इसमें सरकार को इस बिल को पास कराने के लिए लोकसभा के 543 में से 272 और राज्यसभा के 245 में से 123 सांसदों का समर्थन जरूरी है। बता दें कि लोकसभा में बीजेपी के 240 सांसद हैं लेकिन सरकार को अपने सहयोगी पार्टियों- टीडीपी के 16, जदयू के 12, शिवसेना (शिंदे) के 7 और लोजपा (रामविलास) के 5 सांसदों की भी जरूरत होगी। एनडीए के छोटे सहयोगी दल जैसे- रालोद के पास 2, जेडीएस के पास 2 और अपना दल (सोनेलाल) का एक सांसद हैं।
राज्यसभा के संख्या की बात करें तो राज्यसभा में अभी 9 सीटें खाली हैं तो ऐसे में मौजूदा 236 में से 119 सांसदों का समर्थन जरूरी है। बीजेपी के पास 96 सांसद हैं। वहीं एनडीए की सहयोगी पार्टियों के पास 19 सांसद हैं। ऐसे में सरकार को 6 नॉमिनेट सांसदों के समर्थन की दरकार होगी।
You may also like
-
RJD से अब रोज 5 सवाल करेगी नितीश की JDU, तेजस्वी की बढ़ेगी मुश्किलें
-
पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाला: ममता सरकार को SC से झटका, कलकत्ता HC का फैसला बरकरार
-
ट्रम्प ने भारत पर लगाया 26 प्रतिशत टैरिफ कहा- ‘जैसे को तैसा’
-
रामनवमी पर 1 करोड़ हिन्दू उतरेंगे सड़कों पर, बीजेपी और टीएमसी आमने-सामने
-
बुलडोजरों के बीच जलती झोपड़ी से अपना स्कूल बैग बचा लाई बच्ची की कहानी आपको झकझोर देगी