Congress District Presidents Meeting: लगातार चुनावी हार और दलबदल के चलते कमजोर होती कांग्रेस अब अपने जिला संगठनों को सशक्त बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इसी क्रम में 3 अप्रैल को दिल्ली में मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों के जिला अध्यक्षों की बैठक होगी।
इस महत्वपूर्ण बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल मौजूद रहेंगे। बैठक का मुख्य उद्देश्य जिला संगठनों की समीक्षा कर उन्हें और अधिक प्रभावी बनाना है।
जिलाध्यक्षों को टिकट वितरण में अहम भूमिका
कांग्रेस अब जिलाध्यक्षों को ज्यादा अधिकार देने पर विचार कर रही है, ताकि वे अपने क्षेत्र में संगठनात्मक फैसलों में निर्णायक भूमिका निभा सकें। पार्टी की रणनीति के तहत पार्षद से लेकर सांसद तक के टिकट वितरण में जिला अध्यक्षों की राय अनिवार्य की जाएगी। इसके अलावा चुनाव समिति की बैठकों में भी जिलाध्यक्षों के सुझाव को प्राथमिकता मिलेगी।
कांग्रेस ने 27 मार्च से देशभर के 250 से अधिक जिला अध्यक्षों के बैच में बैठकें आयोजित की हैं। इसी कड़ी में 3 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित होने वाली बैठक में जिलाध्यक्षों की भूमिका को और प्रभावी बनाने पर चर्चा होगी। इस बैठक में मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़ और दिल्ली के जिला अध्यक्ष भी शामिल होंगे। इसके बाद 9 अप्रैल को गुजरात के अहमदाबाद में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में इस प्रस्ताव को पास किया जाएगा, जिसके बाद इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है।
कांग्रेस को जिलाध्यक्षों की बैठक की जरूरत क्यों पड़ी?
मध्य प्रदेश कांग्रेस पिछले चार चुनावों से हार का सामना कर रही है। 2018 में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के दलबदल के कारण सरकार गिर गई। इससे कई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का जनाधार कमजोर हो गया और उपचुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस अब यह रणनीति अपना रही है कि संगठन को नेता और व्यक्ति आधारित बनाने की बजाय जिलाध्यक्ष केंद्रित किया जाए। इससे जिलाध्यक्षों को अपने क्षेत्र में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी और स्थानीय स्तर पर पार्टी को मजबूती मिलेगी।
वर्तमान में जिलाध्यक्षों के पास हैं ये अधिकार हैं
- जिले की कार्यकारिणी का गठन करना।
- जिले के मोर्चा, संगठन का गठन और समन्वय करना।
- सदस्यता अभियान चलाना और रिपोर्ट तैयार कर प्रदेश को भेजना।
- जिले की समन्वय समिति बनाकर कार्य करना।
- प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का आयोजन कराना।
- सामाजिक कार्यों जैसे नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए कार्य करना।
अब जिलाध्यक्षों को मिल सकते हैं ये अधिकार
- जिलाध्यक्षों को जिले में फैसले लेने के लिए प्रदेश नेतृत्व पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
- संगठनात्मक निर्णय विधायकों, सांसदों की बजाय जिलाध्यक्ष ले सकेंगे।
- हर जिले में कांग्रेस का अपना कार्यालय होगा, जिससे संगठन का संचालन किसी नेता के घर से न होकर पार्टी कार्यालय से हो।
- जिलाध्यक्षों का एआईसीसी (दिल्ली) से सीधा संपर्क होगा।
- पार्षद, स्थानीय निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों के टिकट वितरण में जिलाध्यक्षों की राय को सर्वोपरि रखा जाएगा।
- संगठन में नियुक्तियों के मामले में भी जिलाध्यक्षों की भूमिका अहम होगी।
- ऐसे जिलाध्यक्ष नियुक्त किए जाएंगे जो खुद चुनाव लड़ने के इच्छुक न हों। यदि कोई जिलाध्यक्ष चुनाव लड़ना चाहता है, तो उसे चुनाव से दो साल पहले पद छोड़ना होगा।
जिलाध्यक्षों के चयन को लेकर नई गाइडलाइन पर मंथन
बैठक में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर नई गाइडलाइन तय की जा सकती है। मध्य प्रदेश कांग्रेस की ओर से निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:
- जिला अध्यक्ष की औसत उम्र 50 साल हो।
- वह कांग्रेस की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हो।
- उसके पास 10-15 साल का पार्टी अनुभव हो।
- वह तकनीकी रूप से सक्षम हो और सोशल मीडिया पर सक्रिय हो।
- उसमें कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने की क्षमता हो।
कांग्रेस की रणनीति कितनी सफल होगी?
मध्य प्रदेश कांग्रेस संगठन ने बीते शुक्रवार को सभी जिला अध्यक्षों की जूम मीटिंग आयोजित की, जिसमें दिल्ली बैठक का एजेंडा साझा किया गया। जिला अध्यक्षों को निर्देश दिए गए कि वे बैठक में अपने जिले की संगठनात्मक जानकारी लेकर आएं। इसमें विधानसभा, मंडलम, सेक्टर और बूथ स्तर की जानकारी, पिछले चुनावों में कांग्रेस की हार-जीत का आकलन और जिले में कांग्रेस की संपत्तियों की जानकारी शामिल है।
कांग्रेस के इस नए कदम से संगठन को मजबूती मिलने की उम्मीद है, लेकिन यह भी संभव है कि इससे पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ सकती है। कई वरिष्ठ नेता, जो अब तक टिकट वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं, वे इस बदलाव से असहज हो सकते हैं। हालांकि, यदि यह रणनीति सफल होती है, तो कांग्रेस जमीनी स्तर पर एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा खड़ा करने में सफल हो सकती है।
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