बनारस का ज्ञानवापी और कबीर का इस्लाम !

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मंदिर तोड़ने से कुफ्र-काफिरी खत्म नहीं होती। असहाय की हाय निकलती हैै। नफरत जंगल की आग सी है, खुद को भी खत्म कर डालती है! जब तक कोई निडर रहेगा जगत में, समझना कि कबीर जिंदा है!

#vijaymanohartiwari

कबीर से श्रेष्ठ कोई नहीं, जो आज के समय में राह दिखाए। वे उसी बनारस में थे, जहाँ #ज्ञानवापी है। वे उन्हीं गलियों से रोज गुजरे होंगे, जहां विश्वनाथ हैं।

छह सौ साल पहले वह सिकंदर लोदी नाम के एक कट्टर कब्जेदार का भयावह दौर था, जिसे इतिहास में बुतों का विनाश करने वाला बताया गया है।

उसे विध्वंस की यह वैचारिक विरासत अपने मजहब से मिली थी। भारत भर में वह एक अंधड़ से भरा हुआ कठिन समय था।

कबीर ऐसे ही समय में हुए। सदियों से बनारस ज्ञान का केंद्र रहा, जहां एक ही समय में भक्तिकाल के अनेक संत कवियों की चहल-पहल रही।

कबीर, तुलसी, सूर, फरीद, दादू, मलूका जैसे अनगिनत नाम हैं। बनारस भारत का एक ऐसा भवन था, जहां यह धारा बह रही थी। वही कबीर भोपाल के भारत भवन में आयतों की तरह उतरे।

पांच मिनट के एक अंतराल सहित दो घंटे कबीर सबके सामने चले-फिरे। बैठे-बोले। अपनी जिंदगी में आए परिजनों, संतों और शिष्यों का जिक्र करते हुए अपनी अमर वाणी को गाया।

माँ ने उन्हें पैदा होते ही छोड़ दिया था। उनके रोने की आवाज ने एक और माँ की गोद में उन्हें पहुंचा दिया। वे उसी के घर में पले-बढ़े। वह मुस्लिम परिवार एक लावारिस बच्चे की परवरिश के कारण जाति से बाहर कर दिया गया।

उसे मस्जिद जाने की इजाजत नहीं थी। कबीर बड़े हुए तो किसी ने हिकारत से उन्हें “नाजायज काफिर’ कह दिया तो कबीर कहते हैं कि उसी पल मुझे लगा कि आसमान छोटा हो गया।

लगा किसी ने गाली दी। वे माँ से घर आकर पूछते हैं कि अब्बा मस्जिद क्यों नहीं जाते? माँ बताती हैं कि उन्हें जात बाहर कर दिया गया है। मगर तू फिक्र मत कर। तुझे अल्लाह ने बनाया है। तू तो अल्लाह के घर की गाय है।

कबीर के बालमन पर जो कुछ अंकित हुआ, वह किसी भी मुल्ले की सबसे ऊंची अजान और किसी भी कर्मकांड से बहुत ऊंची बात थी, जो इंसान को इंसान नहीं समझते और जो कट्टरता की खूंटी से खुद को बांधे हुए हैं।

लोई नाम की लड़की से उनकी शादी होती है और घर आकर वह अपने प्रेमी का जिक्र कर देती है। कबीर उसे उसके पास ही छोड़ने के लिए पोटली लेकर निकल पड़ते हैं।

ऐसा भला और अच्छा आदमी लोई ने न देखा था, न सुना था। वह बीच रास्ते से लौटने को कहती है।

वह कबीर के बेटे कमाल और बेटी कमाली की मां बनती है। कबीर करघे पर काम करते हुए जीवन के सत्य का अनुसंधान करते हैं।

उनका सत्य सीधी-सरल वाणी में बहना शुरू होता है तो उनके समय के धुरंधर संत कवियों से सोहबत शुरू हो जाती है।

कभी फरीद घर आ रहे हैं, कभी सूरदास आकर बैठे हैं, कभी रैदास विरजे हैं। एक बार जहानी बख्श नाम के अकड़दार सूफी के आने की सूचना मिली तो उनके स्वागत में एक सुअर घर के बाहर बंधवा दिया!

भिखारी घर आता है तो लोई कहती है कि इस घर में भीख नहीं, सीख मिलती है। कबीर उससे जिरह करते हैं। भीख क्यों मांगना, कुछ काम क्यों नहीं करना। जो कर सकते हो, करो। गा सकते हो गाओ।

खुश होकर सारे भिखारी कबीर की ही वाणी गा-गाकर दुनिया को सुनाने लगे।

सिकंदर लोदी तक उनकी प्रसिद्धि पहुंची तो उसने एक आदमी कबीर के पास भेजा। कबीर ने वहीं सिकंदर की क्लास ले ली।

बोले-अपने सुलतान से कहना कि वह मंदिर तोड़ने की बजाए बहादुरी के दूसरे के काम करे।

मंदिर तोड़ने से कुफ्र-काफिरी खत्म नहीं होती। असहाय की हाय निकलती हैै। नफरत जंगल की आग सी है, खुद को भी खत्म कर डालती है!
कबीर से पूछा गया- तू इस्लाम को मानता है कि नहीं?
कबीर बोले- और तू इस्लाम को जानता है कि नहीं?

रायपुर में 1961 में जन्में प्रसिद्ध रंगकर्मी, गायक और पद्मश्री शेखर सेन की यह एकल अभिनय प्रस्तुति 434 वीं थी। छोटे-छोटे जीवन के किस्सों के बीच कबीर की अमरवाणी को पिरोते हुए कबीर के दर्शन और जीवन को समग्र रूप में प्रस्तुत करने का उनका प्रयास पूरे देश ने सिर आंखों पर लिया है।

मुझे लगता है कि यह कॉलेज और यूनिवर्सिटी में सालाना उत्सव के रूप में होना चाहिए। नौकरी और तरक्की के आसमानी ख्वाबों में विचर रही नई पीढ़ी को भारत की जड़ और भारत की जमीन का अहसास होना चाहिए।

भारत के उन कष्टों का अनुभव भी होना चाहिए जो अतीत में भोगे गए हैं। इतिहास के भयानक अंधड़ों से जूझने की शक्ति जिनसे मिली, ये वो लोग हैं।

छह सौ साल पहले दिल्ली या आगरे में कौन बैठा देश की छाती पर मूंग दल रहा था, आज किसी को नाम नहीं मालूम।

कबीर जिस दौर में हुए तब मुगलों को भारत आने में सौ साल का समय था। जिस सिकंदर लोदी ने जिंदगी भर मंदिर तोड़े वह सिलसिला मुगलों के मरने तक चलना था।

कबीर घावों से भरी भारत की उन सदियों में ईश्वर का भेजा हुआ मरहम ही थे। जीवन की चादर ज्यों की त्यों रख देने वाले कबीर अथाह हैं। अनंंत हैं।

वे सब तरह के दायरों के परे हैं। वे एक ऐेसे आसमान हैं, जिस पर किसी मान्यता की कोई खरोंच नहीं है।

“जब तक कोई निडर रहेगा जगत में, समझना कि कबीर जिंदा है!’ शेखर सेन की इस प्रभावी प्रस्तुति का यह आखिरी संवाद है।


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