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यह पाखंड है; या भैयाजी जोशी के इस विचार में सचमुच सच्चाई भी है? क्योंकि, कुछ दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा मुगल सम्राट औरंगज़ेब की कब्र को हटाने की मांग के बीच, वरिष्ठ आरएसएस नेता सुरेश ‘भैयाजी’ जोशी ने सोमवार (31 मार्च, 2025) को कहा कि यह विषय अनावश्यक रूप से उठाया गया है.
उनकी मृत्यु यहां हुई. इसीलिए उनकी कब्र यहां बनी है. जिसकी श्रद्धा होगी, वह औरंगजेब की कब्र पर जाएगा. जो जाना चाहते हैं, वे जाएं. इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. इस मुद्दे को तूल नहीं दिया जाना चाहिए. महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भी सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिशों की आलोचना करते हुए रविवार को कहा कि धर्म या जाति के नजरिए से इतिहास की घटनाओं का मतलब नहीं निकालना चाहिए.
चेताया कि इतिहास के ज्ञान के लिए “व्हाट्स ऐप फॉरवर्ड” पर निर्भर रहना ठीक नहीं है. “इतिहास को व्हाट्स ऐप पर पढ़ना बंद कर दीजिए,” ठाकरे ने कहा. सवाल है, इस “अनावश्यक” मुद्दे को तूल देने वाले, जेसीबी भेजकर कब्र को मिटा देने की मांग करने वाले, कारसेवा की चेतावनी देने वाले या हुमायूं के मकबरे का दौरा करने वाले कौन लोग हैं?
केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के पार्टनर और सरकार में मंत्री आरपीआई (ए) नेता रामदास आठवले ने भी प्रश्न उठाया है कि औरंगज़ेब 1707 में मरा…फिर उसकी कब्र को अभी क्यों हटाना? लेकिन आठवले भी यह नहीं बताते कि वो कौन हैं, जिन्होंने 317 साल पहले मरे औरंगज़ेब की कब्र को संभाजीनगर से हटाने की मांग उठाई है?
सतारा से सांसद उदयनराजे भोंसले क्या भाजपा के एमपी नहीं हैं? क्या भोंसले ने सबसे पहले यह विषय नहीं उठाया? “द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार भोंसले ने 7 मार्च शुक्रवार को कहा था, “कब्र की जरूरत क्या है? जेसीबी लाओ और कब्र को हटा दो. औरंगज़ेब एक चोर और लुटेरा था. उसका महिमामंडन क्यों? वह लूटने के लिए आया था. जो लोग उसकी कब्र पर दुआ के लिए जाते हैं, वे कब्र अपने घर ले जाएं. क्या ये लोग उसके वंशज हैं?”
सुरेश “भैयाजी” जोशी 12 साल तक (2009 से 2021) आरएसएस के सरकार्यवाह (महासचिव) रहे हैं. यानी, सरसंघ चालक के बाद दूसरे नंबर का ओहदा. उनकी संघ में प्रतिष्ठा है, सम्मान है. वह कोई बयान दे रहे हैं, तो उसको हवा में नहीं उड़ाया जा सकता.
इसीलिए, औरंगज़ेब की कब्र के बारे में आज जब उनकी “नसीहत” सामने आई तो मीडिया ने उसको हाथों हाथ लिया. क्योंकि भैयाजी जोशी की नसीहत संघ के मुख्य प्रवक्ता सुनील अंबेकर के इस बयान के बाद आई है कि, “औरंगजेब अप्रासंगिक है, लेकिन उसकी कब्र का मुद्दा नहीं.” मतलब, औरंगजेब की कब्र का विषय प्रासंगिक है.
संभवतः इसीलिए अंबेकर के बयान को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आधिकारिक मत मानकर भाजपा, विहिप, बजरंग दल और अन्य विचार परिवार के सहोदरों ने “अनावश्यक” (बकौल भैयाजी) मुद्दे को एजेंडे से अलग नहीं किया है?
भैयाजी चूंकि संघ में किसी ओहदे पर नहीं हैं, लिहाजा उनकी “नसीहत” को कितनी गंभीरता से लिया जाता है, देखना होगा. मगर बात निकली है तो दूर तलक जाएगी… लोग जालिम हैं, हरेक बात का ताना देंगे. कभी भाजपा की मुखर आवाज़ रहे और अब तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद (जिन्होंने 2024 में बीजेपी के हैवीवेट दिलीप घोष को हराया था) कह रहे हैं कि “राणा सांगा के पोते महाराणा प्रताप थे.
महाराणा प्रताप की लड़ाई अकबर से थी. अकबर उनको हराना चाहता था. जिस मान सिंह ने अकबर का साथ देकर महाराणा प्रताप के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उसके वंशज राजस्थान की भाजपा सरकार में डिप्टी सीएम हैं. ग्वालियर राजघराने के वंशज, जिन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को किले में नहीं घुसने दिया, वह आज केंद्र की भाजपा सरकार में मंत्री हैं.
इन सवालों के जवाब देगी भाजपा? देश के गद्दारों के साथ तो ये लोग (भाजपा) हैं. इतिहास के मुद्दों को ये लोग उठाएंगे तो जवाब दिया जाएगा. अन्यथा भाजपा को बताना ये चाहिए कि गरीबी रेखा के नीचे 105 करोड़ लोग हो गए हैं. क्योंकि भाजपा कह रही है कि 25 करोड़ लोगों को उसने गरीबी रेखा से ऊपर उठा लिया है और 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन वह दे रही है.
“द टेलीग्राफ” को दिए एक इंटरव्यू में, औरंगज़ेब की जीवनीकार और अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी की इतिहासकार ऑड्री ट्रश्के ने कहा था, “औरंगज़ेब को एक इस्लामी कट्टरपंथी के रूप में खलनायक बनाना गलत इतिहास है, लेकिन अगर आप हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह एक अच्छी कहानी है.”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष और मुगलों पर कई किताबों के लेखक हेरंब चतुर्वेदी ने भी कहा, “अगर औरंगज़ेब ने मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया, तो उसने कई मंदिरों को अनुदान भी दिया. जिनमें सोमेश्वर महादेव अरैल, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, उज्जैन का महाकाल मंदिर और बगंबरी तथा वाराणसी के जंगमबाड़ी के मंदिर शामिल हैं.
बालाजी मंदिर को उसने न केवल अनुदान दिया, बल्कि राजस्व-मुक्त भूमि भी प्रदान की. फरमान में लिखा है कि “यह घी के दीपकों को लगातार जलाने और साम्राज्य की समृद्धि व स्थायित्व के लिए प्रार्थना करने हेतु था.”
चतुर्वेदी ने यह भी कहा, “औपनिवेशिक इतिहास लेखन ने सांप्रदायिक इतिहास लेखन को जन्म दिया, और 1857 के विद्रोह के बाद यह और बढ़ गया, क्योंकि ब्रिटिश समझ गए थे कि अगर हिंदू और मुसलमान एकजुट हो गए तो वे यहां टिक नहीं पाएंगे.
अगर आज औपनिवेशिक इतिहास को खारिज करने की मांग उठती है, तो हमें इस सांप्रदायिक इतिहास लेखन पर वापस नहीं जाना चाहिए.” कुलमिलाकर, भैयाजी जोशी का बयान यदि सचमुच “नसीहत” है तो औरंगजेब और सैंकड़ों साल पुरानी उसकी कब्र का मुद्दा वाकई “अनावश्यक” है. अन्यथा, संघ के आधिकारिक मुख्य प्रवक्ता अंबेकर कह ही चुके कि औरंगजेब नहीं, औरंगजेब की कब्र प्रासंगिक है. (साभार हरकारा)
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