TMC JPC PM CM Removal Bill: संसद के मानसून सत्र में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद से हटाने से जुड़े विधेयकों को पेश किया गया।
अब इस पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बड़ा बयान दिया है।
पार्टी ने इस समिति को ‘तमाशा’ करार देते हुए कहा कि वह इसमें कोई सदस्य नामित नहीं करेगी।
टीएमसी का कहना है कि यह समिति केवल औपचारिकता है और इससे लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
ममता ने विधेयक को बताया ‘सुपर इमरजेंसी’
टीएमसी ने जेपीसी को लेकर जारी बयान में कहा, हम 130वें संविधान संशोधन विधेयक का प्रस्ताव के स्तर पर ही विरोध करते हैं।
हमारी दृष्टि में यह संयुक्त समिति केवल एक औपचारिकता और तमाशा है। इसलिए तृणमूल कांग्रेस इसमें कोई सदस्य नहीं भेजेगी।
पार्टी का कहना है कि सरकार पहले ही नीतियां तय कर चुकी है और समिति की रिपोर्ट महज खानापूर्ति होगी।
टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी पहले इन विधेयकों का कड़ा विरोध किया था।
उन्होंने इसे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की साजिश बताया था।
ममता ने कहा था, यह विधेयक सुपर आपातकाल से भी खतरनाक है।
इसका उद्देश्य एक व्यक्ति-एक पार्टी की तानाशाही स्थापित करना है। यह संविधान के मूल ढांचे को रौंदने वाला कदम है।”
तीन बड़े बिल जेपीसी को भेजे गए
केंद्र सरकार ने मानसून सत्र के दौरान तीन अहम विधेयक पेश किए थे—
1. केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक 2025
2. संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025
3. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025
इन बिलों को पेश करते समय लोकसभा में विपक्ष ने जमकर हंगामा किया था।
प्रतियां फाड़कर गृहमंत्री अमित शाह की ओर फेंकी गईं।
बाद में सरकार ने प्रस्ताव पारित कर इन विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का निर्णय लिया।
इस समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे।
जेपीसी को अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र में सौंपनी है, जो नवंबर के तीसरे सप्ताह में होने की संभावना है।
30 दिन जेल में रहने पर हटेंगे पीएम-सीएम
इन विधेयकों के तहत यह प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति यदि गंभीर आरोपों में गिरफ्तार होकर जेल जाता है।
ऐसे हालात में वह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री के पद पर रहते हुए शासन नहीं चला सकेगा।
प्रस्तावित कानून के अनुसार, गिरफ्तारी के 30 दिन के भीतर यदि कोर्ट से जमानत नहीं मिलती, तो 31वें दिन वह अयोग्य हो जाएगा।
तब उसे केंद्र में प्रधानमंत्री या राज्यों में मुख्यमंत्री द्वारा पद से हटाया जाएगा।
बाद में कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और जमानत मिलने पर वह अपने पद पर पुनः बहाल हो सकता है।
सरकार का तर्क है कि यह कानून राजनीति में शुचिता लाने और आपराधिक मामलों में जेल गए नेताओं को सत्ता से दूर रखने के लिए जरूरी है।
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसका दुरुपयोग कर सरकार विरोधी नेताओं को फंसाया जाएगा।
कई विपक्षी दल भी बिल के विरोध में
टीएमसी के अलावा कई विपक्षी दल भी इस बिल का विरोध कर रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष इस कानून का इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को जेल में डालने के लिए कर सकता है।
वहीं सरकार का दावा है कि यह कदम जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
बहरहाल, जेपीसी की रिपोर्ट आने के बाद इन विधेयकों पर संसद के शीतकालीन सत्र में बहस होगी।
टीएमसी और अन्य विपक्षी दलों का रुख देखते हुए इस मुद्दे पर सियासी घमासान तेज होना तय है।
इस पूरे विवाद से साफ है कि आने वाले समय में संसद के भीतर और बाहर इस कानून को लेकर बड़ा राजनीतिक संग्राम देखने को मिलेगा।
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