Sunday 22 Sep 2019 / 5:10 AM

सिंघार की बगावत विरासत है या कांग्रेस की कबीलाई संस्कृति

  • Bypoliticswala.com
  • Publish Date: 05-09-2019 / 12:02 पूर्वाह्न
  • Update Date: 05-09-2019 / 12:02 पूर्वाह्न

द टेलीप्रिंटर (NEWS Agency)

मप्र के वनमंत्री उमंग सिंघार के बोल मप्र की सियासत में कांग्रेस की गुटीय विरासत और कबीलाई संस्कृति का पीढ़ीगत हस्तांतरण है। उमंग का परिचय स्व. जमुना देवी के भतीजे के रूप में भी है वही जमुना देवी जो मप्र में बुआजी के नाम से आदिवासी और महिला अस्मिता की बेख़ौफ़ नजीर रही है।

जमुना देवी जिनके बेबाक बोल से मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्गिराजा पूरे समय सहमे से रहते थे लेकिन उनकी जातीय पूंजी और कांग्रेस के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता को दिग्विजय ने सदैव आदर और यथोचित सम्मान दिया। स्व.जमुना देवी ने भी सदैव दिग्विजयसिंह के साथ अपने मतभेदों को अनुशासनहीनता की सीमा तक नही जाने दिया। लेकिन उनके भतीजे उमंग सिंघार ने शायद पीढ़ीगत विरासत से राजनीतिक मर्यादाओं को पूरी तरह से तिरोहित कर दिया है उन्होंने जिस भाषा और तरीके को दिग्विजयसिंह के विरुद्ध चुना है वह किसी भी सूरत में एक कैबिनेट मिनिस्टर की गरिमा के साथ न्याय नही करता है।

उमंग सिंघार धार जिले की गंधवानी सीट से जीतकर आते है । जमुनादेवी पड़ोस की ही कुक्षी सीट से जीतती रही है। धार ,झाबुआ, रतलाम,बड़वानी,खँडवा, खरगौन,का आदिवासी इलाका असल में जमुनादेवी के जमीनी वर्चस्व और दिग्विजय सिंह के समर्थन से खड़े हुए कांतिलाल भूरिया,हनी बघेल जैसे नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा का मैदान भी है दिग्विजयसिंह ने इस पूरे वनवासी बैल्ट में जमुनादेवी के विरोधियों को आगे बढाया और राजनीतिक रूप से उन्हें ताकत दी है।

जाहिर है जमुनादेवी के दौर की राजनीतिक अदावत आज भी इस बैल्ट में बदस्तूर है लेकिन मामला आज सियासी मर्यादाओं के पूरी तरह से तार तार होने का भी है। यह मप्र की कांग्रेस सरकार के इकबाल के लिये भी बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र में सरकार सामूहिक उत्तरदायित्व के मान्य सिद्धान्त पर काम करती है। दलीय अनुशासन में बंधा रहना मंत्री का संवैधानिक दायित्व भले न हो पर उसकी विश्वसनीयता के लिये यह आधारभूत तत्व है,फिलहाल मप्र की कमलनाथ सरकार इस पैमाने पर खरी नही उतर पा रही है ऐसा नही लगता कि मंत्रिमंडल का सुपर बॉस सीएम के नाते कमलनाथ है उनके कई मंत्री पार्टी और दल की मर्यादाओं को तार तार कर रहे है।

वन मंत्री उमंग सिंघार ने तो जिस तरह की शब्दावली का प्रयोग दिग्विजयसिंह के विरुद्ध किया है वैसा तो विपक्षी बीजेपी के लोग भी नही करते रहे है दिग्विजय के मामले में उनकी हिन्दू विरोधी छवि जरूर बीजेपी के निशाने पर रही है लेकिन ब्लैकमेलर, खनन-शराब माफिया, जैसे आरोप बीजेपी भी कभी आधिकारिक रूप से नही लगा पाई है। जाहिर है मप्र में दिग्विजय और जमुनादेवी के भतीजे मंत्री के बीच की यह जंग आगे दूर तलक जाएगी क्योंकि मंत्रीमंडल के सभी दिग्विजयसिंह समर्थक मंत्री अब उमंग के विरुद्ध एकजुट हो रहे है। मुख्यमंत्री कमलनाथ की इस मामले में चुप्पी सरकार में उनकी सुपर बॉस की इमेज को कटघरे में खड़ा कर रहा है।न केवल सरकार की जनस्वीकार्यता बल्कि मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ की छवि के लिये भी यह शुभकर नही है।

वैसे उमंग सिंघार के इस रुख के पीछे उस विरासत को भी समझने की जरूरत है जो काँग्रेस के चाल चरित्र का अंतर्निहित गुणधर्म है। दिग्विजय सिंह मप्र की सियासत के अपरिहार्य तत्व है अर्जुनसिंह ,मोतीलाल बोरा,श्यामाचरण शुक्ला के मंत्रिमण्डलीय दौर हो या पीसीसी के दो बार अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल। दस साल मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी पारी उन्हें मप्र की कांग्रेस सियासत में एक ऐसे तत्व के रूप में स्थापित कर चुकी है जिसे स्वीकार किये बिना न तो आज कांग्रेस की गाड़ी आगे बढ़ सकती है और न मप्र की समग्र राजनीतिक तस्वीर को मुकम्मल रूप से समझा जा सकता।

आज उमंग सिंघार के बोल की तह में जाने की आवश्यकता है ,जमुनादेवी कहा करती थी कि वे तंदूर की आग में जल रही है इसके मायने दिग्विजयसिंह को सरकार में निशाने पर लेना होता था लेकिन दिग्विजय इसे वुआजी का दुलार कहकर कमतर करने की कोशिशें किया करते थे यहां एक तथ्य यह भी याद रखना होगा कि जिस दौर में दिग्विजय सीएम हुआ करते थे वह कांग्रेस आलाकमान के स्तर पर कमोबेश आज की तरह ही कमजोरी के ग्रहण से पीड़ित था।नरसिंहराव के साथ दिग्विजय ने रणनीतिक याराना बना रखा था तो वह 10 जनपथ के साथ भी अपने तार जोड़े हुए थे जब सीताराम केसरी की बेरहम विदाई के साथ सोनिया युग का आगाज हुआ तो दिग्विजय दिग्गिराजा की तरह वजनदार साबित हुए इसलिए जमुना देवी,दिलीप सिंह भूरिया और दूसरे दिग्गजों की चुनौती से वह बेफ़िक्र रहा करते थे। जमुनादेवी की कद कभी दिल्ली दरबार मे मजबूत नही हो पाया और प्रदेश के दूसरे दिग्गज सिंधिया जैसी मुखरता का साहस नही कर पाते थे।

आज परिस्थितियां बदली हुई है उमंग सिंघार के तार राहुल गांधी से सीधे जुड़े है वह पढ़े लिखे आदिवासी तो है ही उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी खुला समर्थन है। उनकी गिनती सिंधिया कोटे में नही होती है क्योंकि वे खुद अपनी जीत में सक्षम है उनके पास खुद की विरासत है इसलिये किसी टिकट के लिये वे सिफारिश के मोहताज नही है।लेकिन वह सिंधिया से सीधे जुड़े है ताकि उनकी पृथक पहचान बनी रहे।उमंग जानते है कि वे अकेले सक्षम नही है और जमीन पर दिग्विजयसिंह और कमलनाथ की युति बहुत ही मजबूती और व्यापकता लिए है।इसलिये सिंधिया के साथ उनका रणनीतिक रिश्ता बना है ।ग्वालियर जिले के प्रभारी मंत्री के रूप में उमंग की नियुक्ति इस रिश्ते की बानगी है क्योंकि ग्वालियर और धार जिलों के बीच कभी कोई साम्य नही रहा है न ही उमंग कभी ग्वालियर आते जाते रहे है।जाहिर है उमंग के बोल केवल उनके नही है बल्कि इनके पीछे मप्र की काँग्रेस गुटबाजी को गहराई से समझने की जरूरत है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये दिग्गिराजा बनाम उमंग सिंघार का झगड़ा असल में उसी 60 साल पुरानी बीमारी का उभरना है जो इस पार्टी के डीएनए में समाई हुई है।कभी अर्जुनसिंह कभी बोरा,कभी श्यामाचरन तो कभी डीपी मिश्रा जैसे राजनीति के चाणक्य भी मप्र की राजनीति से इस बीमारी को निजात नही दिला पाए।पिछले 40 साल से दिग्विजयसिंह तो इस खेल के खिलाड़ी भी रहे है और कई बार खेत भी।उन्हें पता है कि उनकी भूमिका क्या होनी चाहिये ?वे यह भी जानते है कि कमलनाथ किस हद तक उनके साथ युति बनाकर चलने वाले है इसलिये मुख्यमंत्री की चुप्पी को केवल उनकी मजबूरी नही समझा जा सकता है। राजनीतिक जानकर मानते है कि शैडो सीएम बनना दिग्विजयसिंह का कोई शौक नही है वे राजनीति में छाया नही रियल खेल के सिद्धहस्त खिलाड़ी है।उनकी जमाई बिसात पर फिलहाल कांग्रेस में कोई विकल्प नही है क्योंकि वे राजा होकर भी सैनिकों की फ़ौज पालने के शौकीन है अकेले दरबारियों और कारोबारियों की नही।सँयोग से मप्र में दिग्गिराजा को अप्रासंगिक करने के लिये जो योद्धा सामने खड़े है वे महाराजा है या वाणिज्यकार।