Sunday 22 Sep 2019 / 5:02 AM

जेटली ने ही दिग्विजय को राजा से संन्यासी बनने को मजबूर किया

  • Bypoliticswala.com
  • Publish Date: 24-08-2019 / 2:56 अपराह्न
  • Update Date: 24-08-2019 / 2:56 अपराह्न

 

2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा में बीजेपी को प्रचंड बहुमत के पीछे
चेहरा भले उमा भारती का रहा पर दिमाग अरुण जेटली का ही था

इंदौर। अरुण जेटली नहीं रहे। उनके वित्तमंत्री के कार्यकाल की खूब चर्चा है। मध्यप्रदेश ने लगभग उनको भुला दिया है। जबकि मध्यप्रदेश में बीजेपी को प्रचंड बहुमत अरुण जेटली ने ही दिलवाया। वे उस चुनाव में प्रदेश के चुनाव प्रभारी थे। 2003 में चेहरा भले उमा भारती का सामने था, पर जनता का और दिग्विजय सिंह का सामना अरुण जेटली ही करते थे। 2003का चुनाव बीजेपी के लिए वो चुनाव साबित हुआ जिसके बाद बीजेपी ने यहां अपनी जड़ें मजबूत की। बीजेपी ने सबसे बड़ा बहुमत भी किया। कुल सीटों में से 173सीटें बीजेपी ने जीती। इस पूरे अभियान को बंद कमरे से चलाने का जिम्मा अनिल दवे जी के पास था, पर पब्लिक और मीडिया के बीच बात अरुण जेटली ही रखते थे। आज प्रदेश बीजेपी ने लगभग उन्हें भुला दिया है। यहां कई ऐसे बड़े नेता पैदा हो गए हैं, जो ये दावा करते हैं कि प्रदेश में बीजेपी को उन्होंने ही खड़ा किया है। दिग्विजय को मिस्टर बंटाढार नाम भी जेटली ने ही दिया। भले ही जीत के बाद ये उमा भारती के साथ जुड़ गया. उस हार के बाद ही दिग्विजय सिंह को दस साल के लिए राजनीति से संन्यास लेना पड़ा।
राजनीति के जानकार इस बात को अच्छे से जानते हैं कि दिग्विजय के शासन में सड़क, बिजली, पानी की बड़ी दिक्कत रही पर जनता को उस दौर में बीजेपी के पक्ष में लाना आसान नहीं था. आखिर, मुकाबला चुनावी राजनीति के शातिर और गोटियां बिठाने के माहिर दिग्विजय सिंह से था। दिग्विजय सिंह कहा भी करते थे चुनाव मैनेजमेन्ट से जीते जाते हैं. शायद दिग्विजय की ये चुनावी दलील ही वकील अरुण जेटली ने पकड़ ली। उसके बाद ऐसा चुनावी मैनेजमेंट खड़ा किया कि जनता की अदालत में दिग्विजय का प्रबंधन पूरी तरह फेल रहा। अरुण जेटली ने दिगिवजय सिंह को कई मौके पर खुली बहस के लिए चुनौती भी दी। 16 साल पहले जब जेटली मधयपदेश के प्रभारी के तौर पर आए, तो राजनीति में दलगत बाते भूलकर बीजेपी, कांग्रेस दोनों के युवा नेता उनके जैसा जानकार, विषयों की समझ रखने वाला बनना चाहते थे। वे युवाओं के रोल मॉडल रहे। उनके भाषण और प्रेस कांफ्रेंस भी बहुत कुछ सिखाते थे। पिछले दस सालों में जिस अरुण जेटली को हमने देखा उससे वे बहुत अलग थे। आज के अरुण जेटली में थोड़ा सा ज्ञान का गुरुर, तंज़ कसने की बेताबी और
श्रेय लेने की होड़ दिखाई देने लगी थी। पर मधयपदेश में आये जेटली में सरलता, दूसरों को बराबरी देना और श्रेय के कोई चिंता नहीं दिखाई देती थी। यही कारण था कि प्रदेश में बीजेपी को प्रचंड बहुमत दिलवाने के बाद भी कभी वे उसमे अपना हिस्सा लेने नहीं आये, न ही उन्होंने कभी ये जताने या
बताने की कोशिश की।